चन्द्रालय से आई तस्वीर

दीपावली पर चन्द्रालय से तस्वीर आयी
हर साल ऐसे ही सजाते हैं पापा
पिछले साल की तस्वीर भी कहीं सम्भाल कर रखी है
क्योंकि आखिरी बार ढाई वर्ष पहले जाना हुआ था वहाँ।

1979 में चुना गया मार्बल का एक नेमप्लेट
ले आयी थी , चार साल पहले
याकि अपने हिस्से का माइका
ले आयी थी, चार साल पहले

पेपर में घूमा , मार्बल का टुकड़ा
अभी एंटीक नहीं हुआ है
लेकिन इस तस्वीर में कितना कुछ नहीं दिख रहा
सब एंटीक पड़ा है
जिसे ज़िन्दगी से जोड़े रखने में
मेरे पिताजी को आनंद है
दादा रहते हैं अभी भी
इस घर में
मेरे पिताजी का आनंद है
इसलिए जाते नहीं और कहीं
सजाते हैं
दिवाली में चन्द्र आलय ,
जिसे देख कर मेरे सारी परिवार का
भाई बहनों का आनंद है।

आनंद कहीं जाते नहीं
वे याद में बसते हैं।
उन्हें सम्भालना पड़ता है।
माँ सम्भाल रही है,
पापा सम्भाल रहे हैं।
चाचा चाची बुआ
भैया भाभी
सब मिलकर सम्भाल रहे हैं
मिलते जुलते प्रगाढ़ कर रहे हैं
की चन्द्र आलय अमर रहेगा
जय प्रकाश नगर के उस कोने में
अडिग रहेगा।

वो खिड़की खुलती रहेगी
जिसकी रॉड पकड़ कर
कनेल और हरसिंगार देखते थे
झाँकता रहेगा आखिरी कमरा
नगर तक आने वाली गलियों में
अपने बच्चों की गाड़ियों के आवाज़ सुनने को
और हँसेगी वो
सीधे आँचल की साड़ी सुबह सम्भाले
खुरपी हाथ में डाले
“आईब गेलहिं, बड दुर्लभ भ गेल छि गे ”
का आंखों में प्यार लिये
आँचल पसार लिये

उस खिड़की को देखिये इस तस्वीर में
वो यादों की लाइब्रेरी है
जिसकी किताबें अमरीका से लेकर
असम तक एक एक सदस्य इशू करा गया
लाईब्रेरियन ने पर्मानेंट परमिट दिया था
जाओ ले जाओ मेरे जाने और आने का
मतलब नहीं है मैं सर्वत्र विद्यमान हूँ।
दहिना पैर हूँ हुनमान का
अडिग हूँ , चंद्रालय की पहचान बनकर
आना देखना टिककर फ्लैशबैक में
पूरी पिक्चर मिलेगी
पीली डायनिंग टेबल का फॉरमेट बदलेगा
वो पर रखी वहीं मिलेगी
मैं जाऊँगी नहीं
म्यूज़ियम बन जाऊँगी
तुम फिर फिर घूमने आना
जैसे आया जाया करते थे
मेरी बात हमेशा ऐसे होगी
जैसे बाड़ी में जाया करते थे
लीची के पेड़ पर चढ़ते थे
नए साल की रातों पर
मैगी बनाया करते थे
ठंड में ठिठरते गैराज बन्द करने का ज़िम्मा
एक दूसरे पे आढ़ाया करते थे
दवा की शीशियों से ढिबरी
बनाया करते थे
किरासन टेल की डिबिया तब
छतों पे सजाया करते थे
आज लाइटें चूम रही हैं
जिन दीवारों को
दादा जी उन्हें चूने से सजाया करते थे।
घरौंदा बनता था छोटी छत पर।
कभी हम भी दिवाली में
चन्द्रआलय जाया करते थे।

पोस्टमैन! वाट्सअप को खबर दे आओ

पोस्टमैन ! वाट्सअप को खबर दे आओ

वाट्सअप इंडिया तक खबर पहुंचनी चाहिए कि भारत आपका व्यापक यूज़र बेस है तो कृपया यहाँ की संस्कृति से जुड़े पकवान इमोजी में डलवाएं। गुजिया, गुलाबजामुन, जलेबी का भी इमोजी होना चहिए।
खाली 5 लोग तक फॉरवर्ड रेस्ट्रिक्ट करने का नियम हमारे लिए बाकी सब कुछ अदर कंट्री के लिए !

अनार पटाखा, चक्री, सुतली बम पटाखा सब कितना बढियाँ लगेगा इमोजी छोड़ेंगे तो। कितने भारतीय दीवाली के रात में आफिस में बैठ कर व्हाइट कॉलर जॉब के नाम और स्वेच्छा से फर्स्ट वर्ल्ड कंट्री के सूचना प्रौद्योगिकी को संभालने के लिए गुलामी करते बैठेंगे । कितने व्यस्त माँ बाप के बच्चे खाली मोबाइल लेकर बाहर से ऑर्डर कराए हुए खाने को खाते काउच पर शेरवानी पहने पोटैटो बनेंगे काहे की उनके कोई दोस्त नहीं बन पाते वे सेंसिटिव हैं। तो ई सब मोटी जनता का ख्याल वाट्सअप क्यों नही ख्याल रखता । स्टीकर भर से काम नहीं चलेगा । इमोजी चाहिये इन लोग को ।

लहंगा शेरवानी में भी आदमी का फोटो बनवाये , साड़ी में भी महिला को रखिये । पूजा का घण्टी , लछमी जी सब लगाइये इमोजी में, गणेश जी हमारे इंटरनेशनल ख्याति पाए भगवान हैं , कृष्णा जी और बाँसुरी मिसिंग है, सब डाल दीजिए । बहुत बड़ा यूज़र बेस बौराया है आपके लिए उसके बारे में सोचिए।

प्रज्ञा मिश्र

6 nov 2017

#वाट्सअप #watsaap

तस्वीर

तस्वीर

कैमरा अगर मुताबिक तस्वीर लेना भूल जाये
तो स्क्रीनशॉट करिये
एडिट करिये फिट करिये
डिस्कार्ड मत करिए
क्योंकि लम्हा ज़रूरी था।

बन्द एलबम को खोलना
उन्हें धूप दिखाना
स्केल में पाउडर डाल
नमी खंगालना
सब बिना मतलब के काम नहीं हैं
याद संजोना ज़रूरी है।

लोग हँसते है ,अरे!
क्या तस्वीर निकालते रहती हो
कहाँ करोगी डेवलप अब
लैपटॉप में बंद कर रखती हो।

पर देखती भी तो हूँ
अचानक सालों बाद
“हे !सी व्हाट डिड आई फाइंड!”
की तसल्ली कर।
कैसे होगा ये सब
अगर दुबक जाऊंगी
कैमरे से शर्मा कर।

यादों की जुगाड़ उनको
भूल कर फिर फिर
याद करने के लिए होती है।

बच्चा बिना जल्दबाज़ी के
ज़िन्दगी की चॉक्लेट
पॉकेट में रखना चाहता है।
मोमेंट दर मोमेंट
थोड़ी सी ऑक्सीटोसिन
बढ़ाये रखना चाहता है।

निकालो सब बाहर अभी,
अलमारी में जितने बन्द राज़ हैं।
सबकी तस्वीर करते हैं
और परवाह करनी किसे
लोग बाद में कुछ कहते हैं
बाद क्या होता है?
उसके बाद क्या होता है?
जिसे लिया ही नहीं
जिसे जिया ही नहीं
वो फ्रेम ही कहाँ होता है?

नहीं रहेंगे उदास बेहाल बिखरे
हमें तैयार होना है
अभी होना है
एक तस्वीर लेनी है
ऐसे नहीं तो वैसे
लहराना है रंग होकर
बगैर हो या फिल्टर।

प्रज्ञा मिश्र
3 नवम्बर 2018

तस्वीर – दीपिका कोलस्कर से साभार

रिंगटोन अनुभूति

Muk Jande Ne Jism Ta,
Par Aatma Amar Hai,
Jide Ang Sang Prabhu Hai,
Onu Phir Kisda Daar Hai

ये कीर्तन के बोल हैं , इसके आगे बड़े शांति पूर्वक ,
“सत नाम श्री वाहेगुरु ” गाया जाता है।

जगजीत सिंह जी की आवाज़ में पहली बार सुना था और अब तक उनकी आवाज़ में ही सुनती आ रही हूँ ।

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महेन्द्रू

सोचती हूँ चलने से पहले हो आऊँ
हर उस गली से जहाँ से शुरुआत हुई थी ,
जब देखती हूँ तो याद नहीं आता
मैं बचपन में कहाँ कहाँ गयी थी।
ये कुछ रंगोली सी तमन्नाओं वाली
ज़िन्दगी जो जन्म लेते से पचीस की हुई।
फिर पालने वाले क्या खूब मिले,
किसी से कोई शिकायत ही न रही।
न किताब खुलते से पिनोकीओ खड़ा होता है
न स्याही कॉपी पे फैलती है
न दीवार से टँगे संतरों में पेनीसीलीन
के हरे फंगस लगते है
न कपड़े दिल्ली से आने तक बिस्तर पर
महीनों पड़े मिलते हैं
न कोई लिखता है धड़ाधड़ धड़ाधड़
कुछ न बोल पाने की छटपटाहट में
न डेढ़ दिन के गीले कपड़े सड़े महकते हैं
अव्यवस्था से ही प्रेम हो जाये तो
व्यवस्था में भी मन अव्यवस्थित रहता है
वैसे भी अब उस मकान में कोई नही रहता है ।

यादों की परत

हर साल दीवाली की सफाई में यादों की परत से धूल हटायी जाती है। उन सारे बेहतरीन दोस्तों को याद किया जाता है जिनके साथ शामें बेफिक्र थी। वो आज भी बिना मतलब याद करते हैं, बताने की फुरसत तो मेरे पास भी कम है।डायरी को तीन बजे वाली धूप में रख दिया है।

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अभिज्ञान उवाच

22 अक्टूबर 2018

अभिज्ञान उवाच

आज फिर खेल कर आने के बाद मेरे छह वर्षीय सुपुत्र
अभिज्ञान मोज़े खोलते हुए नज़रे नीची किये बहुत आई-एम-डन की तरह से बोले:

“मम्मी ट्वेंटी सेवेन ओक्टोबर को हमारी छुट्टी हो रही है उसके बाद मुझे ऑस्ट्रेलिया जाना है। फिर यू एस ए।”

ऑफिस से घर आने के बाद मैं डिनर टेबल पर भात और सरसों-सोहिजन-आलू की सब्ज़ी मज़े मे खा रही थी। उसके वाक्य पर , मैं और अन्य सदस्य व्यंग्यात्मक शैली में उसको देखने लगे।बोले कुछ नहीं। सोहिजन स्वादिष्ट था।

दूसरा मोज़ा खोलते अभिज्ञान और व्यथित होकर बोला:
अरे मेरा पासपोर्ट ही नहीं बनाए कोई , पापा कुछ करते क्यों नहीं।

अबकी दादी थोड़ा हँसी। पुचकार कर कल ही ले जाके बनवा देने का ढाँढस मिला।

अभिज्ञान फिर बहुत गम्भीरता से ठुनकते हुए बोले:

“अरे आप लोग समझते नहीं, मैं कहीं नहीं जाता। मैं जयपुर नहीं गया, राजस्थान नहीं गया, पाकिस्तान नहीं गया , नागपुर भी नहीं गया। मैं कहीं नही गया। मैं बस दिल्ली जाता हूँ दिल्ली ।”

हँसते हुए दादी बोली – की भेलौ? कथी सब पढ़ा दै छौ सब कियो तोरा ? (संगत के संदर्भ में)

सब उसे एकटक सुन रहे थे, हँसने का साहस बस दादी और छोटी दीदी में था क्योंकि वे ही उसको बाद में प्यार से समेटती भी हैं। मेरा हँसा या पट्टी पढ़ाया उसको पचता भी नहीं और जमता भी नहीं शायद- ” एक तो जरा सा मिल रही हैं उसमें भी चालू” ।
तो मैंने सरसों-सोहिजन-आलू पर कंसन्ट्रेट किया। इसमें भी रस था, उसमें भी रस था , बात चबाने के लिए चावल का भूजा साथ हो लिया।

डिमांड पर फ़ैसला पापा के फ्रेश होकर आने तक चला।

फिर सब रफा दफा करने का यंत्र टी.वी. थोड़ी देर चला ।

टीवी बन्द होने तक महत्वकांक्षा और प्रश्न दोनों चले गए।

मेंटल मैथ के प्रैक्टिस पेपर से गुडनाइट हुआ।

#आमआदमीकाबच्चा