कैसे कैसे बचपन

कैसे कैसे बचपन

तुम्हारी किताब में बंद गुलाब के सूखे फूल
अलमारी में एक तह लगे खिलौनो के सेट
नहीं रहे मेरे होने में
मिले मुझे कीड़े लगे चने
छाँट कर बढ़ा देने को और
ऊँघती पसीने की बदबू
ट्रेन और बसों में
एक बचपन काटने के लिए
तुम आबाद हुए और मेरी
कलम फली फूली
बहुत दिया ऊपर वाले ने
याद में सँजोने के लिए
किसी का कुछ घाटा नहीं है
कोई खाली हाथ जाता नहीं है
तुम्हारे तोहफे शीशों में बंद
शान बढ़ाते हैं हाकिम हो
कोई ढूँढता ही जाता है
ताखों पर गिरे टूटे
चश्मे बनवाने के लिए।

11 Jan 2019

थकन

रास्ते में पड़ा मेरे काम का समान
किसी और को दे दिया जाए
उन कमरों तक बढ़ने दिया जाए
जहाँ दिल रहता है जहाँ मैं रहती हूँ।

कोई रौशनी जुगनू बनकर देर रात
खिड़की के बाहर आती है ।
पर ठंड का बहाना है और सारे पर्दे बन्द।
वो खड़ी रही नहीं जाती है।
डराती है बनकर अजन्मी अकांछाओं का प्रेत।
कौंधती हैं होकर मेरे मस्तिष्क में कागज़ पे निकलती सम्वेदनाएँ बनकर ।

बात-चीत

अरे सर !जिंदगी भर थोड़े न जीना था,
जितनी जिंदगी थी उतना ही जीना था
इसलिए रंजिश भुला दी
और आगे बढ़ गए।
आप कहते हैं
इनको फरक नहीं पड़ता
फरक तो इतना पड़ा कि
भाईसाहब दार्शनिक बन गए!

बहता बादल, सूखे पत्ते
और सड़क के पत्थर पे भी
कविता कर गए।

गहरी सांस लेकर घोल देने
की आदत हो गई
जो नहीं घुला
उसमे डॉक्टरी ही गयी।

एक हाथ की दूरी पर बैठे दोस्त
कई बार बुलाते रहे
और वो अपनी आँखों को
किसी शून्य में टिका के रहे

मन मैराथन दौड़ रहा है
जब तक साँस नहीं टिकती
श्रावणी!
जो आवाज़ कानों तक
गयी ही नहीं
उस पर कौन सी चिड़ियाँ उड़ती?

-प्रज्ञा 13 जनवरी 2017

मन के हारे हार है

चींटी हार नहीं मानती है
कितनी मसली गयी
लुढ़काई गयी
बोझ सहे
सब नियती मान कर
बढ़ती जाती है
हम चींटी ही तो हैं
प्रकृति के आगे
इसलिए हम हार नहीं मानते हैं
बढ़ते जाते हैं
जीत की मुस्कान लिए।

#मनकेहारेहारहै #मनकजीतजीत।

रिवाली में वारली

मुंबई, बोरीवली, सिद्धार्थ नगर स्थित प्रतिष्ठित गायत्री मंदिर की दीवारों को सजा कर देखने के लिए बहुत खासा आकर्षण तैयार हो चुका है ।

महाराष्ट्र की बेहतरीन आदिवासी वारली चित्रकला को बहुत करीब से देखने का मौका , इतना महीन बारीक काम और कितने सुंदर सन्देश।

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मीठी सौंफ का फूलना

मीठी सौंफ का फूलना

प्रकृति में वनस्पतियों में पाया जाने वाला अरेंजमेंट इनफ्लोरेसेन्स(पुष्पक्रम) कहलाता है। कल नेशनल पार्क में वारली आदिवासी ये सुंदर सी खाने योग्य वनस्पति बेच रहे थे तब मुझे इसकी सुंदर बनावट ने अकर्षित किया। हम सफारी की टिकट वाली लाइन में लगे थे वहाँ एक बच्चा खा भी रहा था, मैंने उसकी माँ से पूछा इसे क्या कहते हैं, वो बोलीं, ” मीठी सोंफ आहे” , तो पता चला काफी आम चीज़ है ये तो, सौंफ है ये तो। हमने तुरन्त हरी हरी मीठी सौंफ का एक गुच्छ खरीदा।

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रूदाली

रूदाली

जब रूदाली पिक्चर आयी थी तब मैं स्कूल में थी। किससे किसका क्या रिश्ता था और कौन क्यों रोये इन सारी बातों की पकड़ कहानी डिकोड करने पर बढ़ी ।उस समय “ओह ओके अच्छा” , की समझदारी में गर्दन हिला दिया था।

रुदलियाँ दहाड़ मार कर रोती हैं। दहाड़ निकालने की ताकत स्वतः आती होगी , आनुवंशिकी है , ये पहले दक्षता, फिर अनुभव, फिर पेशा बनती है और फिर थोप दी जाती है कि तुम्हारा यही काम है ।

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