अंशुमन

ऐसे ही बचपन पलटता है
घुटनो से चलता हुआ
चुपचाप पैरों से चल पड़ता है
देखते ही देखते कितनी जल्दी
नटखट शरारतें करता हुआ
गोदी से उतर उंगली पकड़ता है
और हरदम मुझे ही खींचते हुए
अपने मासूम रास्तों पर निकलता है
जहाँ छोटी सी चींटी होती है
चावल का गिरा टुकड़ा भी
कहीं कोई चीनी का दाना
चुटकी से लेकर उठा कर दिखाना
रत्ती भर का लड़का
धरती से चिपका हुआ
छोटी छोटी बातों में भी
कितनी किलकारी भरता है।

#प्रज्ञा

Routes and the Destination

All the things we do
memories we take,
let them come alive
for the moment’s sake.

how much do you give,
how far do you go,
it is right here in
the seeds you sow.

as long as you say
I’m not yet done
life goes on
and so does fun.

Joys you read were,
springs that blossomed.
Joys you dealt were
Troubles you toppled! Routes are destined
through the choices
you favoured!
life is yours
so the vices and virtues

– Pragya {from the diary of May 2015}

पिंजड़ा

सरलता जटिल जब
हो सुगम हि दुर्गम
ये समकक्ष आये
कोई अंतर बताये!
मैं लौह युग में आया ,
एक पिंजड़ा बनाया
कुछ रंगीन बेचे,
कुछ काले खुरेचे
जो पर फड़फड़ाय
दीवारें टकराये।
फिर एक जिन्न बोला
बस इतना ही टोला!
वहीँ घर बसाया
बस उतना कमाया!
कभी हाथ बाहेर,
कभी पैर बाहेर
जेबें टटोली
हमेशा थी खाली।
बहुत लालची था
पिंजड़ों का माली।
एक बेजान चिड़िया,
धराशायी काया।
चली फिर सफ़र पे
तुलसी की छाया।

मेरा सत्व बोला
मैं मिटटी का चोला
पटक दी खुदाई
मैं दम्भी था मौला
मैं लौह का सृजक
पर मिटटी निवाला
ले ली ना मुझसे
मेरे जल की हाला!

– 14 अप्रैल, 2016
शुन्य अपने सिरों को समेटने का प्रयास कर रहा है कि जैसे उसे आतुरता हो लो -फिर चूहे को चूहा!

मुझसे मेरी बात नहीं होती

आज से बारह साल पहले लिखी एक कविता।

कहीं न कहीं मुझसे ही
मेरी बात नहीं होती वर्ना
ये उलझन
दिन रात नहीं होती।

नहीं होते ये एहसास
जिनके शब्द ही न हों,
नहीं होते ये पल
जिनमें, हम, हम ही न हों।

अंधेरे कमरे के
उस कोने में वो
बैठी अकेली
थी चीखती
अंदर ही अंदर
क्योंकि
आवाज सुन
कोई आयेगा!
शहर की भीड़ भाड़ में
जगह नहीं है
दौड़ कर कोई कहाँ जायेगा?

ऐसा कुछ न होता
जो मैं मेरे साथ ही होती
पिछले कुछ महीनों में
मुझसे मेरी मुलाकात हुई होती।
फिर ये खला दिन रात नही होती।

आज सोचा जो निकलूं
खुद को तलाश लेने
तो शब्द भटकते हैं।
कहते हैं
हम नहीं साथ उनके
जो हर लफ़्ज़ पर अटकते है।

– 04 मार्च 2006 ,12.3 AM
(दिवाली 2016 की सफाई में कुछ पन्नों से मिली।)
मैं उस वर्ष खालसा कॉलेज, दिल्ली विश्विद्यालय के द्वतीय स्नातक वर्ष के आखिरी सत्र में थी। मार्च का मतलब वार्षिक परिक्षा का महीना रहा होगा।

रीचार्ज

लड़खड़ाती नौ परसेंट की बैटरी
जब घंटे भर में चार्ज नहीं हुई
तब फ़ोन का पुर्ज़ा पुर्ज़ा खोल दिया
फिर तहज़ीब से जोड़ दिया
इकतीस परसेंट की जान आ गई
छिटपुट जमा बिखरी ऊर्जा
बारिश देखने के काम आ गई।

स्टील के जग और छोटी कप में
विंग की लॉबी तक चाय आ गयी।
चाय की चुस्की है बारिश है
है बच्चों का शोर गुल,
थोड़ा लीक से हटकर उनको भी
एक बजे की दुपहरी बारिश में
भींगने की आज़ादी दी गयी।
मन के ब्लॉक जगह पे आये
और मैं थोड़ा रीचार्ज हो गयी।

बारिशों में भीगता भोला बचपन और उसकी कौतूहल देखना दिमाग को स्पा में नहाने देने जैसा है, मन रीचार्ज हो जाता है ,जैसे हफ्ते भर में सारी ऊर्जा जो खींच ली गई थी बारिश में बैठ वापस आ रही हो, दिमागी हरयाली ,कोंपल विचारों वाली और पास खड़ा है दौड़ता , झूमता, नाचता , बेरवाह , अलमस्त पलछिन।

#प्रज्ञा 7 जुलाई 2018

गुलाब का कांटा चुभता है

तुम मेरा सुकून नहीं
मेरी तड़प हो,
छटपटाहट हो,
जिसके आने से ही
दिल को सुकून आता है।

कितना अजीब दस्तूर
हो गया आज कल
मेरे वजूद में
अपनी धड़क के पास
और पास जाते जाने से
दिल का धड़कना तेज़ हो जाता है।

सुनते थे ऐसी
मोहोब्बत के बारे में
जिसमें बेमानी
हो जाती है दुनियादारी,
हो गयी मुझे
एक यार से ऐसी यारी।

वो क्या हो गया मेरा
इसका पता लगते लगाते
मेरा मन भर आता है
तुम्हे सोचते सोचते
वक़्त निकल जाता है।

तुम्हे याद करके
मैं जितना हँसती नहीं
उतने तो आँसू आ जाते हैं
सारी रात कई दफा
करवट करवट जगाते हैं।

आँखों से टपक गई तुम्हें
पास न पाने की धक
मझे और बड़ा कर जाती है
पूरा कर जाती है
देती है इरादा थोड़ा और
कुछ और पैदल चलूँ
पूरी किताब लिख डालूँ
किसी मोड़ पे तो मिलोगे
मुझसे ऐसे जैसे
मैं मिलती हूँ
अपने सपनों से।

खुली आंखें
हाथ पाने को बढ़े हुए,
मेरी तरफ आते हाथ
मेरे लिए बने हाथ
उँगलियाँ,
खाँचे सी बनी फिट हो गईं
तुम्हारी मज़बूत
पकड़ में ।

“अब भी सोचती हो
दूर जाने का?”
“बहुत बहाना बनाना पड़ता है
पास आने का।”
“फिर ढूंढती क्यों हो?”
“तुम्हें कैसे पता?”
“मैं बिन बताये आता हूँ
तब भी वहीं खड़ी मिलती हो।”
“यही तो बात है।”
“शिकायत?”
“नहीं, शिद्दत।”
“और मैं क्यों आता हूँ?”
“तुम जानो।”
“पगली! मिलने।”
“उहुँ ! कोई काम होगा।”
“नहीं ।”
“सच?”
“सच।”
“यकीन करने का मन करता है।”
“इतने रुंधे गले से?”
“हाँ! गुलाब का काँटा चुभता है।”

#प्रज्ञा 2 जुलाई 2018

नया चश्मा

कुछ सालों की ज़रूरत पर
गौर करते हुए,
मैंने नया चश्मा लिया है।
नो कोम्प्रोमाईज़ का चश्मा।

दुनिया हाई डेफिनिशन में दिख रही है।
माथे पे बल कम है।

किताबों से भरी पूरी एक दीवार है
पेपर बैक, हार्ड बाउंड
रंग बिरंगी , काँच के पल्लों में सजी धजी
सामने शीशम की मेज़
उसपे भूरी चमक
आराम कुर्सी
और बातें हो रही हैं
चाय के साथ
किताबों पर
ये मेरा इत्मिनान होगा।

#प्रज्ञा 1 जुलाई 2018