नज़र का खोट

जब कोई व्यक्ति मुझे बुरा लगता है तो मैं सोचती हूँ कि ये किसी न किसी का तो मित्र होगा। मतलब कोई तो ऐसे होंगे जो इसे पसंद करते होंगे इसके साथ हैंगआउट करते होंगे, हँसते होंगे। मतलब इस व्यक्ति में भी कुछ बात किसी को तो अच्छी लगती होगी।

तो चलो मेरी नज़र से कभी और देखेंगे इस बुरे आदमी को इसके चाहने वालों की नज़र से भी एक बार देखा जाए , क्या पता मेरी नज़र का खोट बदल जाये।

#प्रज्ञाकादर्शन 😊

सफर 1.0

मेरा अब तक का ऑनलाइन हिंदी सफर

मुम्बई के प्रसिद्ध स्लैम पोएट्री वेन्यू “द हैबिटेट” ने मेरे काव्य पाठ को सराहा और कविता “आम का अचार” अपने ऑफिशियल यू ट्यूब चैनल पर प्रसारित किआ:

https://youtu.be/vTPGbNcglvk

हिंदी के नीचे दिए गए ऑनलाइन वेबसाइट पते पर कवितायें /कहानी डिजिटली प्रकाशित:

http://yuvapravartak.com/?p=9623

http://poshampa.org/pehchaan-aur-parvarish/

https://storymirror.com//read/poem/hindi/ph4irmpf/jiivn-tum-itmiinaan-dhro

https://storymirror.com//read/poem/hindi/axjtpfga/pedddh-kaa-rngiin-tnaa

https://storymirror.com//read/story/hindi/xykhbyoe/dophr-kii-ghttnaa-aur-giitaa-kaa-saar

पुरस्कार:
मुक्तांगन-कविता कोश नव प्रतिभा प्रोत्साहन योजना के पाँचवें चरण में कविता
“आम का अचार” के लिए 10 जुलाई 2018 को द्वितीय पुरस्कार प्राप्त।
https://www.facebook.com/1771836453033393/posts/2102118346671867/

अगले बरस फिर आना बसन्त

मैंने जीवन में तीस एक बसंत देखें हैं और वे सब जैसे बस होली का एक दिन हो कर रह गए थे। मैंने देखा ही नहीं की बसंत में फूल खिलते हैं , कितनी तरह के खिलते हैं, सबकी बनावट, सबका रंग सौंदर्य क्या खूब होता है, सभी के पास अपनी एक खासियत होती है। आस-पास खिलते , फलते पेड़ पौधों को देखना तो हुआ था पर इस तरह बसंत महसूस नहीं हुआ था जैसे साल 2019 से होने लगा।

Continue reading

फूल गुलाब का रहस्य

मखमली पंखुड़ियों पर ओस की बूँदें ! जानिए आज सुबह ही आयीं होंगी। गुलाब के खुलते पट के बीचों बीच एक रहस्यमयी किला रहा होगा। बहाने से आसमानी फरिश्तों ने गयी रात कोशिश की होगी उस किले के रहस्य को झांक आने की। ये क्या बात थी? क्यों आसमानी फ़रिश्ते रोज़ ही आते हैं क्या ढूंढते हैं? किस बात का पता करना है ? और न समझ पाए तो अपनी पहचान छुपाने के लिए सूरज की पहली किरण में ओस बन ठहर जाते हैं, उड़ जाते हैं दिन की गर्मी के साथ फिर रात आने के लिए।

वह फूल अपने साथी से बोलता था कि हमारे रहस्य दो ही हैं पहला ये की हमारा सौंदर्य ही हमारी नश्वरता है और दूसरा ये की सृजन के जो बीज हम शरीर में धारण करते हैं वे अपने निर्धारित समय पर मिट्टी में मिल कर ही फलित होते हैं।
साधारण होना क्लिष्ठ है, असहज है, दिशा के विपरीत है, विकसित होना ही प्रचलित के विपरीत जाना है , गुलाब के फूल कितनी सहजता से सुन्दर लगते हैं और उतनी ही सहजता से सृजन की प्रक्रिया को स्वरूप देते हुए इतने सुंदर शरीर को मिट्टी में दे देते हैं क्योंकि वे सहज हैं।

आसमानी फ़रिश्तों को समझ न आएगा गुलाब का रहस्य क्योंकि वे बस मोहित होकर रूप रंग की छान बीन में समय व्यतीत कर जाते हैं , वे धरती में समाते नहीं , वे धरती से जुड़ते भी नहीं।

#प्रज्ञा

फोटो साभार: कांदीवली रहेजा से बिंदु श्रीवास्तव

बोगेनविलिया बोगनविल

ये बसंत के बोगनविल,
हैं हर मौसम के बोगनविल
दीवारों पर लुढ़के खिले कंटीले
सुरक्षाकवच हुए बोगनविल
अलसाये धूप सेकते
सफेद से होते गुलाबी
मेरे कैमरे से देखिए
कांदिवली रहेजा के
आबाद बोगनविल

Continue reading

क्षणिका

आज मैंने काव्य की भाषा में एक नई बात जानी , “क्षणिका” । अभी परसों ही अनुपम चितकारा जी ने मुझे “गूँज” नाम के नए वाट्सअप ग्रूप में शामिल किया ।

अनुपम मेरी दोस्त हैं और इग्नू से जुड़ने के बाद इनसे जान पहचान हुई।हिंदी साहित्य में मेरी रुचि देखते हुए इस ग्रुप में शामिल होने का सुझाव दिया।

पगलाई सोशल मीडिया के दौर में “गूंज” की चालक पद्धति बहुत अनुशासित है।

समूह के नियमों में आज के लिए लिखा है कि “बुधवार के दिन दिए गए शब्द पर क्षणिका गढ़ने हैं। ”

मैंने सादा तरीके से बिना गूगल किये दोस्ती को तरजीह दी और अनुपम से पूछ दिया कि यार ये क्षणिका क्या है?

अनुपम मुझे क्षणिका के अनुपम ज्ञान की तरफ ले गयीं और विकिपीडिया के पेज से जनकारी दिलाई ।

क्षणिका साहित्य की एक विधा है।

“क्षण की अनुभूति को चुटीले शब्दों में पिरोकर परोसना ही क्षणिका होती है। अर्थात् मन में उपजे गहन विचार को थोड़े से शब्दों में इस प्रकार बाँधना कि कलम से निकले हुए शब्द सीधे पाठक के हृदय में उतर जाये।” मगर शब्द धारदार होने चाहिए। तभी क्षणिका सार्थक होगी अन्यथा नहीं।

इसके बारे में और अधिक हम इस विकिपीडिया पृष्ठ से पढ़ सकते हैं:

विकिपीडिया पर क्षणिका की जानकारी

गूंज पर आज का शब्द है “गुलाब” और उसपर मैंने जो क्षणिका लिखी वह थी:

घुटने पर बैठ ऐसे छबीले सा
वो रोज़ मुझको मुझसे माँगता है
‌समाज के खाँचे में फिट
मैं एक घूँट में कैसे बताऊँ
‌गुलाब का काँटा चुभता है

फिर एक जानकार मित्र ने इसे थोड़ा धारदार रखने का सुझाव देने के साथ कुछ त्रुटि सुधार बताया , फिर फाइनल रूप में नीचे लिखी क्षणिका मेरी आज की कृति रही।

घुटने पर बैठ छबीले सा,
रोज़ मुझको मुझसे माँगता है
‌समाज के सांचे में बसी
मैं एक घूँट में कैसे बताऊँ
‌गुलाब का काँटा चुभता है।

प्रज्ञा

अंडा फ्राई

थोड़े टाइम पहले जब यूँ हाथ में नया मोबाइल आता था तो लोग किसी पूज्य की तस्वीर पहली लेते । संस्कार है। कॉपी नई होती तो ओम , जय सरस्वती माँ जैसे कुछ लिखते । अब भी लिख लेते हैं , लोग बहुते संस्कारी हैं । फिर धीरे धीरे जैसे साल बीतता है तो कोर्स की किताब का पन्ना कहाँ और जिल्द दफन की तरह जीने के तरीकों और सामान को देखने के नज़रिये में भी बहुते फेर बदल हो जाता है।

अब देखिए कितनी बातें होती हैं जैसे कौन से शहर में रहते हैं, काम की व्यस्तता कैसी है, घर में कल बम गिरेगा की नहीं, इस साल एग्जाम देने मिलेगा की गारंटी है कि नहीं, बाहर निकलेंगे तो गोली लगेगा की बस पत्त्थर से पिट के लौट आएंगे, पानी के रास्ते देश देश टपना पड़ेगा की बस पहाड़ चढ़ के हो जाएगा, हाइवे पे गाड़ी ले के दूसरे दिन ठामे पहुँच जाएंगे की माथा पर भूस्खलन हो जाएगा , अभी खड़े हैं अभी आठ माला के मलबा में दब के खबर बन गए कहीं, घोटाला हुआ होगा पर कौन देखा है । तो इतना सब मटियामेट है कि एक नया मोबाइल का इतना संस्कारी रसास्वादन काहे किया जाए?

इसलिए आधिकारिक तौर पर अंडा फ्राई की तस्वीर कैमरे से पहली तसवीर लिए हैं।

जीवन क्षणभंगुर है इसका प्रोपोगेंडा बना कर क्या मिलेगा, जैसे गैंडे विलुप्त होने की कगार पर है वैसे हम भी नाखून से लटक कर ही सभ्यता पर लटके हैं।