*हर मौसम की चाँदप्रभा*

प्रभा अपनी अलमारी में
जीवन में देखे परखे
सारे मौसम रखती थी
जितने महीने उतने ढंग
हर बसन्त में पीला रंग
मधुश्रावणी के मेले जैसी
सहज विविधता भरती थी।

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मौसम – अभिज्ञान रचित

मौसम

सुहाना मौसम है
आसमान में चिड़ियाँ उड़ रही है
सड़क पर गाड़ियाँ चल रही हैं
बिल्डिंग्स बड़ी बड़ी
उसमें लोग रहते हैं
यहाँ पर कुछ घर है
यहाँ पर कुछ मॉल हैं
इस सड़क पर काम जारी है।

– मास्टर अभिज्ञान मिश्र
कक्षा 2

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वहाँ दास्ताँ मिली

“माय ग्रन्डपेरेंट्स” लिखकर जिस इतिहास की एक झलक अरुण अंकल ने आज फेसबुक पर साझा की है , मैंने उस इतिहास को देखा था। उनके पैर छुए थे। बैठ कर हौले हौले पैर दबाते हुए उनसे आज़ादी के समय की कहानियाँ सुनी थी। इनको चुपचाप माला जपते मुस्कराते और गर्दन हिला कर आशीर्वाद देते देखा था। ये दो लोग मेरी दादी माँ के जनक जननी है । इन्हें मैं बड़े दादा , बड़ी दादी कहती थी।

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मझोलेपन को आग लगाओ

आज मैंने श्रीकांत वर्मा द्वारा लिया गया ऑक्टविया पॉज़(1980 में भारत में मेक्सिको के राजदूत) का साक्षात्कार पढ़ा। पढ़ने के बाद मेरी यह सोच और भी पक्की हो गयी है कि हमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने बोलने में स्वयं को प्रतिदिन प्रबल करना है। हम भारतीयों की बौद्धिक मध्यम वर्गीयता तब तक बनी रहेगी जब तक हम केवल अंग्रेज़ी को घर आये मेहमान की इज़्ज़त बख्शते रहेंगे।

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