गैर राजनीतिक

खेती बस नील की होने लगी ,

किसान खाने भी लगे

लोग पचाने भी लगे

एवोल्यूशन हो गया है,

रेवोल्यूशन नहीं लगेगा।

जनता सब साइज के जूतों में फिट हो रही है,

बस खड़ा होकर सलाम कहना है

उसके लिए दौड़कर नापना नहीं पड़ता,

एड़ी में घिस नहीं पड़ती।

सामने घास बिछती है,

प्लास्टिक की हरी हरी,

उसी में बकरी चराइये,

नो नीड टु गो एनीवेयर ,

यह देखिये विकास

जस्ट थिंक बिग

सब अच्छा लगेगा।

ज्ञानार्जन

सागर में कितने मोती हैं

कुछ मछुआरे लाते हैं

कुछ तुम तक पहुंचाएं जाते हैं

तुम कुछ धारण करते हो

कुछ अलमारी में धरते हो

जितना भी अर्जन कर पाए

वो सदैव ही कम होगा।

पारावार नहीं भंडारों के

स्वाति नक्षत्र की बूंदों का।

हल्की फुल्की सीढ़ी

इतने गौर से देखोगे तो

आँखें खराब हो जाएंगी

थोड़ा फासला रखो ,

क्या देखना है

कितना देखना है

तय करना पड़ता है!

कितना सोचोगी

दिमाग को और भी काम हैं

जैसे समय पे ब्रेक लगाना।

इतनी देर मत करो,

जितना समझ रहा है

उसे मानती चली जाओ

सोचने को और भी काम है,

जैसे अपने लिए सपने बुनना।

याद नही आ रहा,

भरोसा नही हो रहा,

यहीं रखा था,

कहाँ गया था?

मिलेगा नहीं तो,

जो आया नही तो!

खैर छोड़ो जाने दो

कितना पकड़ोगी

हाथों को और भी काम है

जैसे एक स्ट्रोक में काजल लगाना।

जाऊँ की रहने दूँ?

दौडूं या चलने दूँ?

भागने से नहीं हो रहा!

छलांग में रेलिंग अटक गई तो

खामखा नाक टूट जाएगी!

आह , फिर वही,

तुम्हे कितनी बार कहा है

कशमकश रहने दो,

मंजिलों को और भी काम है

जैसे बढ़ते हुए कदमों को चूम आना!

#प्रज्ञा #Pragya

19 मार्च 2017

एक समय की बात है

एक समय की बात है

एक समय की बात है,
 कोस एक कोस, दूर होते थे
 समय बहुत था सबके पास
 पर साधन पे सब रोते थे।
आज समय ऐसा आया है,
 साधन सब हमने पाया है
 पर समय समय कर रोते हैं
 कोस एक कोस दूर लगते हैं!
एक समय की बात है,
 सड़क न थी जो जाते हम
 पुलिया न थी जो आते तुम।
 घोड़े गाड़ी की कमी रही,
 हा परिजनों की सुधि रही।
आज समय ऐसा आया है,
 तुम तक मुझ तक सड़क हुई,
 छप्पन-भोग आवागमन हुए,
 तुम तक मुझ तक सड़क हुई,
 छप्पन-भोग आवागमन हुए,
 समय की चाल बदल गई!
 वो इंतज़ार के हवाले है...
 आने वाला कोई नहीं।
 आने वाला कोई नहीं।

#time #poem #self #family #distance #hindipoem #pragyamishra8

पदचाप

फरवरी 2015 में मेरे अस्सी वर्षीय दादा जी मुम्बई आये थे। कृतार्थ हूँ कि मेरे निलय पर उनके पूण्य चरण पड़ चुके हैं। काफी नज़दीकी होने के बावजूद पहले नौकरी के कारण और फिर विवाहोपरांत दादा जी से मिलना बेहद कम हो गया । जीवन को बेवजह ज़रूरतों ने घेर लिया और थोड़ी नई नौकरी की मशगूलियत पर 2008 – 2009 में मेरी स्वर्गीय दादी कहती रहीं “बेटा तुम दुर्लभ हो गईं”। कचोट आज तक है कि मुझे तब उनका गलता शरीर नहीं दिखा, कैसे अब तक पता नही। इस हिस्से से जो कुछ निकला उसे मैंने समय-समय पर शब्द का जामा पहनाया, शायद यही पश्चाताप है।

उस साल जब दादा जी आये तब समय बहुत भावुक था पर न उन्होंने खुद को भावुक होने की इजाज़त दी ना मेरी इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी की नौकरी ने मुझको। पर कवियों और लेखकों की कलम पर खुद उनका भी बस नहीं होता वो एक अलग प्राण होती हैं और हमारे हाथ बस लिखने का माध्यम तो उस दिन भी मेरे हाथों के माध्यम से विचलित कलम बन प्राण बोली वो प्रस्तुत कविता एक समय की बात है बन कर निकली:

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सौंदर्य की क्षणभंगुरता

पुष्प!
देखने में कितने अद्भुत होते हैं,
पर उसके पास बैठकर
हमेशा के लिए
उसकी प्रशंसा नहीं की जा सकती।
समय के मौन में
अपनी सुंदरता धारण किये हुए
नए जीवन में परिणत होते हैं, पुष्प।

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