जुड़ाव – आखिरी कड़ी

कैसे भेजते हैं शब्दों में खुद को ,
बता दो,
अभी चिट्ठी लिखूंगी,
लाल स्याही से ,
हौले हौले अक्षर उकेरे जाएंगे ,
जैसे सहला रहे हों गाल,
मोती जैसे गोल मटोल क ख ग घ ,
तुम्हरी बड़ी बड़ी आंखों से पढ़ा जाएगा,
ज़रा चश्मा मोड़ कर बगल की मेज़ पर ,
फिर आगे की कहानी लिखूंगी
कि क्या कुछ चाल चल रहा है
मन बदमाशियों के ,
हो कर लिफाफा बन्द।

One thought on “जुड़ाव – आखिरी कड़ी

  1. Pingback: जुड़ाव और दुराव | शतदल

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