विस्तार

लिखने का शौक बचपन से है। क्या लिखना है , ये मैं तय नहीं करती , तब भी नहीं, अब भी नहीं, बहुत अच्छी बात ये है कि जब भी कलम चली कल्पना ने लिख दिया जो कुछ आंखें देख गयीं थी। लेकिन जहाँ न पहुंचे रवि वहाँ पहुंचे कवि वाली उड़ान चाहिये।

तो ब्लॉग एक विस्तार है, जो होता आ रहा है उसे और बड़ा करने का।

या यूं कहिये अब डिजिटाइजेशन का जमाना है तो डायरी के तितर बितर होने पन्ने बोलने लगे हैं कि, “प्रज्ञा,आई टी की नौकरी के दस साल में अब तुम ठीक ठाक टाइप कर लेती हो, हमको छुट्टी दो कितने दिन अलमारियों की सीलन, कार्टन की घुटन में बंद रहेंगे ये शब्द, टहलने दो इन्हें भी थोड़ी खुली बस्तियों में, जैसे तुम स्वस्थ हो गईं, इनमें भी आ जायेगा कुछ वज़न।”

ख्वाहिशों का पुलिंदा अपनी जगह पर है, मैंने जिंदगी के प्रैक्टिकल एप्रोच को चुना, नए नए सपनो के बीज लगाए।

एक दिन किसी जगह लिखा था:

जाता समय मेरा एक हिस्सा ले गया

आता समय मुझमें एक हिस्सा दे गया

पाने खोने का लेखा जोखा कब किया?

हाथ से छूटती हर याद ने कितना कुछ दिया:

थोड़ी सूझबूझ

थोड़ी समझदारी

थोड़ी वक्त से सुलह

थोड़ी दुनिया दारी

– साल 2013 की डायरी के पन्नों से, जिसके बाद ये आगे की कविता बनी होगी।

करवट

गंगा के किनारे का तेज़ पानी बह गया,

कुछ पुरानी मिट्टी ले गया

कुछ ताज़ी रेत दे गया,

मुट्ठी बन्द करने का फायदा नहीं

रेत फिसलती जाती है।

हफ्ता महीनों में,

महीना तिमाही में,

आधे-आधे हिस्सों का साल

और फिर पूरा एक साल

घड़ी की टिक टिक

कितना कुछ ले जाती है।

-21 अगस्त 2013 12.30 दोपहर

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