मुंबई मेट्रो

धीरे धीरे चाय घुल गई
खड़ी चम्मच की चीनी में
होठ चप चप से
सिल गए
आगे बढ़ने की राजनीति में
हाइवे के किनारे खाट लगी है
बच्ची ठुड्डी हथेलियों पे गड़ाए
तकिए पर टिकी सी
लेटी हुई
छुक छुक चलता ट्रैफिक देख रही है
उठूं या लेटी रहूं
वैसे भी मैं सिर्फ सात साल की हूँ
मेट्रो जब शायद बन जाये
तो उठना होगा
उसमे चढ़ने के लिए
अभी ये मिट्टी हटानी है
मेट्रो के बनने के लिए।

#प्रज्ञा 2 अप्रैल 2018

अप्रैल फूल ज़िन्दगी

अक्समात होती हैं ज़िन्दगी की कई शामें बिना बताए दिमाग ले जाता है आपके व्यस्त वक्त को मूर्ख बना कर मस्ती के शहर में चुरा कर कई बार बिन रोडमैप।

कल कुछ ऐसा ही हुआ होगा, जब छुपन छुपाई के खेल में इतने साल बाद जुहू ने को हमने आइसपाईस – धप्पा बोल दिया ।
शाम आठ पन्द्रह में यही उधेड़बुन थी कि डिनर कहाँ जाना है, क्योंकि हम बहुत कम एक्स्प्लोर करते हैं , तो फिर आराधना की इच्छा से एक नया ईटिंग जॉइंट तय हुआ।
कैफ़े हाइड्रो, बोरीवली,अच्छा कॉन्सेप्ट, पहली बोगी रेल गाड़ी के डिब्बों का नमूना सरीखी ,बाद के माले एक्वेरियम।
खाना बढियाँ,एंबिएंस के मुताबिक, फेवरेट मोमो और अन्य चीनी डिशेज़ आर्डर किये।
फ़ोटो लेने लिवाने का सिलसिला शरीर के इंवॉलेंट्री मांसपेशियों के झपक लेने जैसा है कब कब होता रहता है कहा नहीं जा सकता।

तकरीबन सवा दस बजे हमको लगा कि अब क्या घर वापस लौटना है?
सबने एक दूसरे को बोला कि भई गाड़ी है बस घूम कर आस पास के राउंड लगाते हैं,
थोड़ा हाईवे हो लेते हैं,
अच्छा हाईवे,
हां दहिसर तक ,
पर उधर तो सिर्फ ट्रकों का नज़ारा मिलेगा,
अच्छा तो ठीक है फिर इधर चल लेते हैं जिगेश्वरी तक,
चल दिये।
रात में बिना ट्रैफिक के वेस्टर्न एक्सप्रेस हाईवे पर जाना अच्छा अनुभव होता है मन आगे आगे जाने के लिए ललचता रहता है क्योंकि ब्रेक बार बार नहीं लगानी पड़ती।
जोगेशवरी तक जाना थोड़ा कौवा उड़ान सा प्रतीत हुआ, समय देखते हुए हमने सोचा आगे एयरपोर्ट से यू टर्न चलेगा थोड़ा और चल लेते हैं।
फिर आलोक को खयाल आया कि विले पार्ले में उनके भाई आनंद रहते हैं, और मुझे खयाल आया कि हर साल अप्रैल फूल तो बनाना बनता है आनंद जी को इस साल भी सही!

सबके दिमाग का कीड़ा एक साथ दौड़ा, हुमने घुमाया उन्हें फोन , बोला , “एक लड़का पार्सल लेकर नेहरू नगर के पेट्रोल पम्प पर जाएगा जा के मिल लें। “

आलोक के आइडिया और मेरी एक्टिंग स्किल्स ने पूरा मसला सही जाता दिया।

फिर क्या था , हम गाड़ी के अंदर से मजे लेने लगे, एक कोने में इंतेज़ार करते हुए,
की “लड़का कहाँ है भाभी जी” ऐसा कॉल आएगा तो अप्रैल फूल बनाया जायेगा।
मज़े की बात रही हुआ भी ऐसा ही।

भरोसे का छोटा मोटा फायदा गैर हानिकारक अप्रैल फूल खेलने में लिया जा सकता है ।

तो एक और सदस्य साथ में हुए ,हमने एक साथ सोचा ,पारला तक आये ही हैं तो जुहू चल के यू टर्न लेते हैं, मज़ेदार रहेगा , सब साथ बैठ गए।

आते आते अब लगा कि बस यहां तक आये हैं तो एक फ़ोटो ले लेते हैं।
मन बढ़ता गया, पार्किंग भी ऐसी जगह मिली जो बोल रही हो आइये अपनी गाड़ी यहां लगाइए।
बिना किसी प्लैनिंग बिना किसी तैयारी हम जुहू बीच पर ठहाके लगा रहे थे, समय को अप्रैल फूल बनाने पर , एक अप्रैल की रात साढ़े ग्यारह बजे।

घंटा भर कब निकल गया पता नहीं चला, मन इंस्टा के बूमरैंग जैसा बार बार लहरों से टकरा के तस्वीरें ही ले रहा था और मज़े की बात ये की एक परसेंट की बैटरी भी टकटकी लगाए आंख खोल के चली जा रही थी फ्लाइट मोड पर।

हमने वहां इंस्टेंट तस्वीरें भी डेवलप करा लीं, कहाँ रोज़ आता है कोई ऐसे बस चलते चलते जुहू तक।

फोटोग्राफर भी सीतामढ़ी का था।

पुलिस की गाड़ियों का हॉर्न जुहू खाली कराने लगा हम थक के गाड़ी की ओर चल दिये। बारह पैंतालीस 2 अप्रैल को हम जुहू से वापिस लौट रहे थे तब याद आया कि जलसा है।

इसके आगे लोग बड़ी तस्वीरें ले रहे थे, हम भी जलसा पर रुके , नेमप्लेट ही सही मुंबई का जनरल नॉलेज स्पॉट है, हमने अपनी याद में जोड़ लिया और फिर शुभरात्रि।

#प्रज्ञा #AtRandomZindagi