इतना सारा इमोशनल बैगेज
जरूरी नहीं होता कंधों पर
हाथ की उंगलियां काफी हैं
जमी धूल झट से उड़ाने के लिए
और थोड़ी सी फूंक।

जो और स्टाइल में तरीन होना हो
तो अंगड़ाई भी ले सकते हैं।
मेनू कार्ड में मूड फ्रेश करने
की रेसिपी लिखी है
डिम लाइट में खाइये
खूब जमेगा रंग
अगर न समझने वाला म्यूजिक है
तो और जमेगा रंग

हर दिन कुछ अलग अलग
ऐसी की तैसी कर सकें तो देखिये।

अभी बस चाय, और आज का पेपर
उसके बाद नब्बे के दशक का गाना
“धीरे धीरे से मेरी ज़िंदगी में आना”
कोई किताब
किताब पे धूल!
आज समूचे घर को डस्टिंग मिल गयी
जैसे पैम्परिंग!

कोई ना आजा तू भी आजा
मैगी खाते हैं।

शाम ! आसमान ! पैटर्न!
नीला आकाश
सारा आकाश
अरे चल!
मोहन राकेश की उपन्यास लेने जाते हैं।

#प्रज्ञा #pragya 6 अप्रैल , शनिवार , मुम्बई