तीन गानों का सफर

आजा सनम मधुर चांदनी में हम तुम मिले तो वीराने में भी आ जायेगी बहार…

जा जा रे सुगना जा रे कहि दे सजनवा से
लागी नाहीं छूटे रामा चाहे जिया जाए ….

ये गाने मन के बैकस्टेज जैसे किसी चाय की स्टाल पर अनमस्क चलते हैं मैं इनको गाना तो दूर कभी सुनती भी नहीं थी।

पर कभी घर की सफाई करतेे गुनगुनाते ये अक्सर निकलते हैं, सालों से ।

करीब चार दिन पहले मैं हिंदी/बॉलीवुड संगीत से सम्बद्ध ऑनलाइन पेज से जुड़ी।
वहां की सदस्या रौशनी ने थीम रखा -” प्यार के अनेक रूप और रंग।”

अति उत्तम, क्योंकि प्रेम की भावना जीवन में आर्द्रता लाती है , यात्रा उद्देश्य निष्ठ लगती है।
थीम के मुताबिक सदस्यों ने लाजवाब गाने शेयर किये । युगल जोड़ों का प्रेम, माता-पिता , भाई-बहन के प्रति प्रेम, देश के प्रति श्रद्धा और प्रेम, पशु-पक्षी इत्यादि से जुड़े प्रेम गीत भी ।

मैंने भी कुल तीन गानों के यू-ट्यूब लिंक साझा किए –

पहला :

“जा जा रे सुगना जा रे कहि दे सजनवा से
लागी नाहीं छूटे रामा चाहे जिया जाए”

मजे की बात ये है कि मैंने खुद पिछले 30 सालों में इस गाने को पहली बार पूरा सुना ।
प्रेम पर सैंकड़ो गीत हैं , पर क्यों अंगूठे का क्लिक इसपर पड़ा, इसे तो दो लाइन से ज्यादा आज तक सुना ही नहीं।
लेकिन , कहाँ सुना था, किससे सुना था, कब सुना था, जो इतना याद है सील मोहर की तरह।
ये मैंने पटना में सुना था, कभी पटना सिटी में पर सबसे ज़्यादा महेंद्रू में । मेरी मम्मी सरोज गाती थीं ये वाला गाना और क्या जाने दो लाइन से ज्यादा उनको भी नहीं आता रहा होगा । इतना गाती थीं कि चलता रहता है अभी तक जैसे कॉकलिया से मस्तिष्क तक किसी नर्व में चिपक गया हो । सुन ही लिया ये गाना 21 अप्रैल 2018 को। प्रेम का पहला गीत मेरे कानों में जो पड़ा होगा शायद ।

दूसरा:

Aaja sanam madhur chandni mein hum
Tum mile to virane mein bhi aa jayegi bahaar….
Jhumne lagega aasman
Kehta hai dil aur machalta hai dil
More saajan le chal mujhe taaron ke paar
Lagta nahin hai dil yahan ……..
Chand ka dola saje, dhoom taron mein mache…

ये हमेशा पूरा आता था कानों में ” चाँद का डोला” तक। याद रहता है ये गाना मुझे , मैंने कई बार सुना है। मम्मी गाती थीं। ज्यादातर तब जब वो बहुत खुश होती थीं और बाहर हॉल में आगे आगे पीछे पीछे हाथों को एक अंदाज में लहराए खुद में डांस भी करते देखा था मैंने उन्हे इस गाने पर और कई दफा झूमते आते हाथ पकड़ मुझे साथ में लेकर घूम कर डांस करने के लिए कहती थीं। मैं दो बार कूद कर कुर्सी पे जा कर बैठ जाती थी ।
ये शायद बचपन की टाइम लाइन में सुना दूसरा प्रेम का गीत रहा होगा।

तीसरा:

एल्विस प्रेसली की लव मी टेंडर लव मी स्वीट जिसके बोल इस तरह हैं
Love me tender
Love me sweet
Never let me go
You have made my life complete
And I love you so

Love me tender
Love me true
All my dreams fulfilled
For my darling I love you
And I always will
मैं एल्विस प्रेसली को इसलिए जानती हूँ कि शम्मी कपूर जी की तुलना हमेशा उनसे की जाती है और रॉक एंड रोल उनका काफी प्रसिद्ध है।
इससे अलावा कभी नहीं सुना, मेरा परिवेश नहीं था अंग्रेज़ी गानों का, 2002 में अर्पिता से मिलने तक।
कैसे एनकाउंटर हुआ एल्विस प्रेसली के इतने बेहतरीन संगीत से?
तीस मिनट की कहानी सा है कुछ।
जब से स्मार्टफोन लिया , रेडियो FM से नाता टूट गया,यू ट्यूब,गाना.कॉम में खुद की मर्जी का जब चाहे सुन सकते हैं। सुनते रह सकत हैं ।मार्च 2018 के पहले सप्ताह में मेरा प्रिय जियोनी हैंडसेट खराब हो गया। बोरीवली से अंधेरी तक अब नोकिया के बेसिक मोबाइल और FM का सहारा हुआ।
मुम्बई में ट्रैफिक की नैया खाली कान पार करने की कोशिश कोई मजबूरी में ही करता होगा ।

कान जाये पर प्राण बचायें।

8 मार्च 2018 की सुबह करीब 9.50 बजे शायद विविध भारती पर अंग्रेज़ी में एक महिला का साक्षात्कार आ रहा था जिनका बोलने का लहज़ा इतना प्रभावशाली था कि मैं फिर चैनल शफल नहीं कर पाई।

जैसे ही पता लगा कि बात चीत रंगमंच से जुड़ी है तो पूरा जेनेटिक इंटरेस्ट जाग गया।

स्टेज या थिएटर की कोई भी चर्चा मैं ऐसे सुनती हूँ जैसे बिना रेसिपी सीखे मुझे मास्टर शेफ में उतरना है।

साक्षत्कार सुनते हुए समझ आया कि चर्चा भारत में अंग्रेज़ी नाट्य मंचन की सफलता, लेखन , डायरेक्शन, प्रोडक्शन इत्यादि के बारे में है और वो महिला महाबानो मोदी कोतवाल हैं जिन्होंने भारत में बेहतरीन अंग्रेज़ी नाटक “द वजाइना मोनोलॉग” और उसके हिंदी रूपांतरण “किस्सा योनी का” का सफल निर्देशन और प्रोड्क्शन किया।

10.30 बजने से कुछ मिनट पहले एंकर ने उनसे उनका एक पसन्दीदा गाना पूछा – उन्होंने कहा , “लव मी टेंडर लव मी स्वीट बाय एल्विस प्रेसली।”
तीन मिनट का गाना रहा होगा, मैंने ऐसे सुना कि ऑटो कोई स्टडी रूम हो, बगल में ग्रामोफ़ोन बज रहा है ,मैं साठ के दशक की आराम कुर्सी पे चली गयी शायद सिगार के साथ, शरीर पर सिलवटों के साथ बड़ी सी शॉल, और आंख बंद।

गाना हमेशा के लिए पसंद आ चुका था।

बगल वाले ऑटो को डांट दिया कि PUC क्यों नही कराते हो कितना धुंआ निकल रहा है फिर ऑफिस की स्टैण्डप कॉल पांच मिनट लेट जॉइन की।

महाबानो मोदी कोतवाल का इंटरव्यू कॉल के चक्कर में पूरा नहीं सुन पाई इसका दुख है।

एक दिन किसी ने बस पसन्दीदा गाने रखने के लिए कहा और कितना कुछ मॉर्निंग वॉक करने साथ निकल पड़ा।

#प्रज्ञा 23 अप्रैल

चुप की बातचीत

सोचती हूँ लिखूँ
फिर सोचती हूँ रहने दूँ
लिखूँ
या रहने दूँ
लिखती हूँ
फिर मिटा देती हूं।

सोच चल रही है
एक तरफा
फजूल लगता है ।

तुम सोचती बहुत हो।
क्या कर सकते हो,
कुछ नहीं।

तो लिखूँ या मिटा दूँ?
तुम्हारी मर्ज़ी।
और तुम्हारी ?

अच्छा मिटाने से
क्या मिट जाता है,
इतना आसान है?

होता तो
पशोपेश
न होता।

उठ जाती हूँ
अचानक बिना बताए।

तो फिर,
सीधा चली जाना
मुड़ के मत देखना।

हाथ पे बल पूरा है
मस्तिष्क तो
जैसे अब खड़ा ही हो जाएगा
न मुड़ने के लिए।
……….

फिर यहीं बैठ कर
बिना बात किये
शाम हो गयी।
I
अब तो जाना पड़ेगा।
रुको साथ चलते हैं।
कल तय करोगी?
देखते हैं।

#प्रज्ञा 22 मार्च 2018
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