चुप की बातचीत

सोचती हूँ लिखूँ
फिर सोचती हूँ रहने दूँ
लिखूँ
या रहने दूँ
लिखती हूँ
फिर मिटा देती हूं।

सोच चल रही है
एक तरफा
फजूल लगता है ।

तुम सोचती बहुत हो।
क्या कर सकते हो,
कुछ नहीं।

तो लिखूँ या मिटा दूँ?
तुम्हारी मर्ज़ी।
और तुम्हारी ?

अच्छा मिटाने से
क्या मिट जाता है,
इतना आसान है?

होता तो
पशोपेश
न होता।

उठ जाती हूँ
अचानक बिना बताए।

तो फिर,
सीधा चली जाना
मुड़ के मत देखना।

हाथ पे बल पूरा है
मस्तिष्क तो
जैसे अब खड़ा ही हो जाएगा
न मुड़ने के लिए।
……….

फिर यहीं बैठ कर
बिना बात किये
शाम हो गयी।
I
अब तो जाना पड़ेगा।
रुको साथ चलते हैं।
कल तय करोगी?
देखते हैं।

#प्रज्ञा 22 मार्च 2018
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