मैं घन्टों तुम्हारे बारे में सोचते निकाल देती हूँ
शायद ये तुम्हारे लिए आम बात होगी,
या शायद तुम मुझे कुछ ज्यादा ही बोझिल भावुक व्यक्तित्व समझते हो जिसकी उतनी ही बात का जवाब देना जरूरी
जितने में एक रिश्ते की ऑक्सिजन सप्लाई चालू रहे।
जो भी हो।
तुम्हारे शब्दों में मैं ही हूँ वो जो हम दोनों के बीच अक्षम है।
एक शाम अचानक अचानक हंस के बात कर लेने से पिछला बाकी बचा भूल गए
ऐसा नहीं होता
किसीके पलड़े में बट्टा अधूरा भी भारी बैठता है
किसी का मन भर भी कमती पड़ता है

है कुछ तो जो गड़ता है

थोड़ी जड़ता है
सरस नही लगता।

प्रज्ञा 29 मई 2018