जगरना

ये समा, समा है ये
माँ बनने की उठा पटक का
पालने से स्कूल तक
फिर स्कूल से डूड कूल तक का
मम्मम, मम्मी से
“हो गया माता जी, तुस्सी छड्डो तक का।

इसके शून्य के वर्षों में
कितने जगराते कट गए
खाया पिया जो भी किया
सब उलट बैठ सिर टिक गए।

सपनों की तितलियाँ जब
बन कर फीटस फड़फड़ायीं
अरे! मत पूछिये
आँखे ऊँघना भी भूल आईं।

और तो और
अब करवट की कैद एक।
डॉक्टर बोलीं
“बेटा लेटो बस बाएं पट टेक”।

महीने महीने का
चक्कर क्या कम था।
अब एक महीने में
हाज़री चार दिखाने का हुकुम था।

नब्बे किलो की छुई मुई
धम धम चलती काया।
बिचारे मेरे पति कैसे कहें:
“ना! मैं बिलकुल नहीं लजाया”
मजाल इनकी जो व्यक्त कर सके
ये जानते हैं किस प्रकार
प्रतिदिन टिफ़िन मिल सके।

कपड़े!
कपड़े तो पूछो मत,
कितने बनाये, कितने सिलाये।
महाशय के जनमोपरान्त
सब गदलियों के काम आए।

निर्णायक दिवस की कथा अलग रही।
डॉक्टर बोलीं:
“बेटा लगता है आ गयी वो घड़ी”
अरे घड़ी की करो ऐसी की तैसी
नानी परनानी सब याद आ गईं ऐसी
जैसे बिताने बैठी हूँ गदहा पच्चीसी।

खैर, अहसान कर लल्ला
जब दुनिया में आये, तो लगा!
हमने, दिन का चैन
और रातों की नींद वापिस पाए।

भ्रम था भ्रम!
हर देवी जी जो माँ बनी हों
जाएं उनसे पूछ आयें।

कुंवर जी दिन को सोते हैं
रात में मम्मी को जगाते हैं
जो गलती से गोदी में सो गए
बिस्तर पर डालते तपाक उठ जाते हैं।

हाँ तो जैसे तैसे साल हो गया
मुझको और टिंकू के पप्पा को बैराग हो गया।
जो न हुई तो सुख की नींद,
और सासू माँ का बिस्तर साथ हो गया।

अब लाडले का ग्रोथ ग्राफ
अथ श्री सजग पुराण पढ़ाता है
एक बच्चे को जन्म देने के बाद
मम्मियों का हैप्पी बड्डे हो जाता है।

4 जून , 2018 मुम्बई

डायरी 1

मुझे तुम्हारा सान्निध्य पसंद है
पर एक दिक्कत हो जाती है
मेरी हूँ हूँ से तुम्हारा काम नही चलता
तुमको मेरे साथ मेरी रूचि
भी चाहिए होती है।
अब ये बस के बाहर की बात है
तुम रहो ना अपनी खुश
खबरों में जान पहचान की
टोह तफरी के बीच।

मैं कह दूंगी की मतलब नहीं,
तो मूँह फूल जाएगा तुम्हारा
तो रहने दो मुझे दीवार से टिके
कमरे में अपनी कोशिशों
और सपने में।

जगाती रहती हो और मेरे
ऊँघने से इतनी शिकायत भी है
मैं सारी रात नहीं सोई
तुम जाने कहाँ थी।

चादर नहीं मिल रही थी
थोड़ी देर बाद बेडरोल
हो गयी तो आंख लगी
तुम जाने कहाँ थी।

अभी तुमसे शिकायत नहीं
तो उससे भी दिक्कत
अगर कुछ बोलने लगूँगी
तो उससे भी दिक्कत।

मुझे रहने दो टिके
दीवारों से ये मुझे
सहारा दे रहे हैं
इनकी टेक में मैं ऊपर तुम्हारी
ओर देख पा रही हूँ।

तुम बोलती जा रही हो
मैं लिखती जा रही हूँ
अब यही मेरा काम है
ये अंदर बाहर के कामों
की उम्मीद मुझसे
नाउम्मीद रहें।

#प्रज्ञा मुंबई

4 जून 2018, शाम 4 बजे की कॉफी के साथ