तार

आदमी कितना भी बड़ा होता जाए वो प्रतिदिन सीखता है, आज मैंने माइक रोज़ेन की कविताओं का एक प्रोग्राम अटेंड किया उसमें समझा की कभी कभी हम प्यार को ट्रांजेक्शन बना देते हैं, जैसे कि जब तक सामने वाला प्यार दे नहीं तब तक वो मिला नहीं।

ये एक गलत सोच है जिसमें सुधार होना चाहिए, और लगा मुझे कि इस बार मुझमें सुधार होना चाहिए , तो उन सारे शब्दों के बाणों के लिए क्षमा प्रार्थी हूँ जिनसे तुम्हारा साधारण मन आहत हो गया , जैसे कल वाला मुँह “आधा दर्जन किलो” वगैरह जैसे कुछ बोल गया।

वैसे ये पता होता है, पर अक्सर भूल जातें हैं की प्रेम तो निरन्तर है और हर समय होता रहता है।

ईद मुबारक!

सस्नेह,
प्रज्ञा
मुंबई
16 जून 2018

मन्थन

“would you like you, if you met you?”

कुछ दिन पहले ये सवाल किसी मोटिवेशनल साइट के पेज पर पढ़ा।

जी , ये ठुड्डी पे ऊँगली अड़काये खिड़की के बाहर सोचते रह जाने वाला सा सवाल है,
इसको सोचते कई बार मुस्कराना हो जाता है,
अपने आप से मिलने के लिये बाल भी नहीं बनाया ।
बस चाय का कप लिए और टिक गए ,
टहलते चबूतरा मिल गया
तो हम दोनों को लगा कि बैठा जा सकता है,
थोड़ा चुक्कुमुक्कू से पैर लगाकर
बाहों से घुटनों तक अपने आप को समेट लिया
गोधूली में आंखों के कोर छोटे छोटे से होकर दूर बहुत दूर देखते गए
चाय ठंडी हो गई।
रात हो गयी
डायरी में कुछ नहीं लिखा गया।
जो भी था सब बात बताई
बात सुनी गयी
किसी बात पे हँसना हुआ
ये सब लिख सकते हैं क्या?