राहे क़दम 1 मुझे अच्छी लगी

राहे कदम के पहले एपिसोड को फिर से फुरसत में सुना अभी , काफी अच्छी बात पता चली जो मैं कुछ दिनों से समझने की कोशिश कर रही थी कि “रेखता है क्या”।

बहुत साधारण शब्द में शो होस्ट अंकिता जी ने इसका विवरण दिया और मैं रेख्ते के और करीब हो गयी क्योंकि मैं जो बोलती हूँ वो वहीं से आई है। ज्यादा जानने के लिए लिंक विज़िट किया जाना चाहिए क्योंकि शौकिया तौर पर बहुत लोग रेखता फॉलो करते हैं तो पता भी तो हो कि वो है क्या।

इसके बाद जो शेर इस एपिसोड की शुरुआत में बोला गया मुझे बड़ा अच्छा लगा। ये शेर राहे क़दम के मसकद को एकदम सही शुरआत देता है, जो लोग पहले नायाब लिख गए उनको जानने की शुरुआत। इसको गूगल भी किया मैंने और पहली बार रेख्ते की विकिपीडिया पढ़ी।

ये बेहतरीन आइडिया है। मैं बहुत उत्साहित हूँ इसके आगे के एपिसोड के लिए । अंकिता जी की आवाज का ठहराव और मद्धम बैकग्राउंड म्यूज़िक, साथ में रेट्रो लुक की दीवार पर दिग्गजों का कोलाज , फिर परफेक्टली टाइम्ड स्लाइडिंग इमेजेज़ , मुझे प्रस्तुति भी बेहद बढियाँ लगी।

वीडियो में सुना शेर यहाँ भी डाल रही हूँ :

फ़ारसी – उर्दू
ريختہ کے تُم ہی اُستاد نہیں ہو غالِب‬
کہتے ہیں اگلے زمانے میں کوئی مِیر بھی تھا‬

Reḳhte ke tum hī ustād nahīṅ ho ġhālib,
Kahte haiñ agle zamāne meñ koī ‘mīr’ bhī thā

देवनागरी – Hindi
रेख्ते के तुम ही उत्साद नहीं हो ग़ालिब
कहते हैं अगले ज़माने में कोई मीर भी था

Roman – English
You are not the sole grandmaster of Rekhta, Ghalib
They say, in the ages past, that there was one Mir

पन्द्रह सौ अड़तालीस की यादें

स्वाति बनर्जी ने बड़ी करारी याद ताज़ा की आज , पन्द्रह सौ अड़तालीस ओउट्रम लेन , मुखर्जी नगर , नई दिल्ली में व्यतीत बेतरीन तीन साल।

ये साल 2006 की तस्वीर है जब हमने हमारे सीनियर्स को हॉस्टल में फेयरवेल दी थी।

बहुत साधारण थे हम।

आज 2018 के युवा की तुलना में तो बेहद साधारण और हम ज़मीनी तौर पर खुश थे, हमको अलग से फिजेट स्पिनर नहीं खरीदना पड़ता था , स्ट्रेस में छोटी नोकिया को अपनी दो उंगलियों के सहारे घुमा के बतिया लेते थे। बेहद खुश रहते थे।

हमें कम से कम 10 मोबाइल नम्बर याद हुआ करते थे, अंकल का PCO थोड़ा आगे किसी बंगलो की बेसमेंट में था। सामने बंतो आंटी की दुकान जहाँ से महीने की शुरुआत में बोरबन और अंत में पारले जी लाते थे।

हमने बहुत गप्पें मारी हैं एक दूसरे के कमरों में जुट के, फोन इतने एडवांस नहीं थे। हमारा मनोरंजन भी ऐसा था कि हॉस्टल में जिसे गाना या डांस आता हो उसके टैलेंट को बढ़ावा मिल जाये। भूत की कहानियों को भी।

कजरारे कजरारे हमारा नेशनल एंथम था। हमारी छोटी सी रंगीन टीवी में वो बजा नहीं कि सारे कमरों से लड़कियां निकल कर वो फेमस वाला स्टेप करती थीं और “मेरी अंगड़ाई न टूटे तू आजा” तक हम गा कर फिर धीरे धीरे अपने कमरों में चले जाते थे।

पूरा हॉस्टल एक सा तैयार हो जाता था । गाना बजाना हुआ नहीं कि 1548 के DJ हो जाते थे हॉस्टल के ओनर वीरेन भैया। उनका म्यूजिक सिस्टम लगा कि बस कौन रुकता है। उसी समय वो कव्वाली गाना भी खूब चला था “इश्क़ जैसे है एक आँधी, इश्क है एक तूफ़ां” बज जाए एक बार फिर क्या था, मतलब सारे एक जैसे पचीस तीस लोग समंझिये साथ ही रह रहे थे अलग अलग कमरों में।

हमें मोबाइल से एफ एम तक का लगाव था। फिर
एस एम एस पैक का , फिर म चैट उसके बाद भी हम उसे फेक के ही कहीं बगल में लेट रहते थे। नोकिया कितना भी फेकिये नहीं टूटता था।

दस हज़ार का मोटो रेज़र आया एक दिन 2007 की शुरुआत में फिर वो चोरी हो गया और उसने दो पक्की कही जाने वाली दोस्तों में दरार कर दी। उसके बाद से मोबाइल ने ही कई दरार किये हैं।

एटीएम एक अच्छा अविष्कार था पर ये मोबाइल ना भस्मासुर निकला।

यादें अच्छी आईं आज , नींद कैसी आती है देखती हूँ।

शुभरात्रि।

-प्रज्ञा 29 अगस्त 2018

ये गाना आज भी पसंद है

“सोचा न था” फ़िल्म 2005 में धीरे धीरे से आई थी और बहुत लोगों के दिलों में उतर गयी थी।
उसका सॉफ्ट टाइटल ट्रैक तब से आज तक वैसे ही पसंद आता है। इरशाद कामिल के बोल, संदेश शांडिल्य का संगीत साधना सरगम की आवाज़ गज़ब का जादू करते हैं न्यूरॉन्स पर। भागा दौड़ा सा मस्तिष्क अचानक से शांत हो जाता है।

साथ ही वीरेन के रोल में अभय देओल की बिना धूम धड़ाम वाली एक्टिंग बार बार देख कर वो देओल परिवार के ही हैं ऐसा दो बार सोचना पड़ा था।

अर्पिता को जब भी लगता था कि मेरा मूड कुछ ठीक नहीं है तो वो हमारे रूम में रखे कप्यूटर पे इस गाने को रिपीट प्ले लिस्ट में लगा देती थी । असर अच्छा रहता था। ये गाना गणित के प्रैक्टिस में भी डिस्टर्ब नहीं करता था।

आज भी ट्रफिक में चलते प्ले लिस्ट में ये गाना चल रहा है, इतना शोर है आस पास फिर भी इसके इतिहास और वर्तमान को सोचते हुए मैं मुस्करा रही हूँ।

कभी दिल के करीब
तुम्हें मेरे नसीब यूँ
लाएंगे सोचा न था
एक चाहत का पल
सब सवालों का हल
यूँ पायेंगे सोचा न था।

#प्रज्ञा 30 जुलाई

दोपहर की घटना और गीता का सार

आज दोपहर डेढ़ बजे के आस पास, बच्चे , हमारी विंग के नीचे की कार पार्किंग में खेल रहे थे। तभी, 7 वर्षीया अदा जैसवाल ने जोर से खुशी में कूदते हुए गैस पाइपलाइन वाली डक्ट को देखते हुए कहा,

“वो देखो सब ऊपर कबूतर के बेबी हैं” ,

इतने में अभिज्ञान, पीहू, अरायना,नीलांशी ने कुर्सी लगाई और बारी बारी से डक्ट में बने छोटे से घोंसले को देखने लगे।

पर वहाँ कोई और भी थी, जिसके बारे में अरायना के पिताजी श्री सोमैया जी ने बच्चों को आगाह किया कि तभी, मेरी भी नजर उन मोहतरमा पर पड़ी।

वो थीं गोल मटोल बड़ी सी कबूतरी।

दुबके हुए अपने बच्चों की बड़ी सी अम्मा। एकदम गम्भीर , मुस्तैद, चाक चौबंद पहरेदार सी। कितने खतरे होते हैं एक भूख के अलावा, सबसे बचाने के लिए चौकस रहती है कबूतरी , लाल आँखें तरेरती।

लेकिन जैसे वहाँ कूद रहे इंसान के बच्चों को उसने एक प्रकार की आज्ञा दे दी थी, “आओ आओ देख लो” वाली प्यारी आज्ञा , वो भी बिना किसी भंगिमा के।

अदा,अरायना बड़े समझदार से सबको चिल्लाने से मना करने लगे, उन्होंने कहा , “अरे मत बोलो ज़ोर से बच्चे मर जायेंगे” ये शायद लड़की होने में आनुवंशिकी गुण आता है।

अभिज्ञान ठहाके लगाने लगा, कहने लगा
“कुछ भी , क्या चिल्लाना सुनने से कोई मर जाते हैं ?”

ये ममत्व पे तर्क था, जिसपे बच्चों ने आगे
“नहीं पर डर गए तो” कर के सहमती कर ली ।
फिर कबूतरी और उसके बच्चों का आनंद चुप चाप लिया।

आदमी में एक खासियत होती है, अन्य प्राणियों के दर्द को समझने की खासियत , ये हमारी प्रजाति के न्यूरॉन में सर्वाधिक पाई जाती है, और ये हमको पृथक करती है;
पशु जगत के अन्य जानवरों से, हमको श्रेष्ठ बनाती है। जब मनुष्य अपनी इस प्रवृत्ति को या कहिये शक्ति को भूलने लगता है तब पड़ती है भगवान की जरूरत ।
किसी का विनाश करने के लिए नहीं होती जरूरत भगवान की वो बस इसीलिए आते हैं हमारे मन में ताकी आदमीयत की ताकत बनी रहे, ताकत बनी रहे प्राण रक्षा की क्योंकि यही हमारे होने का मतलब है ।

#myGitaकासार

#प्रज्ञा

Routes and the Destination

All the things we do
memories we take,
let them come alive
for the moment’s sake.

how much do you give,
how far do you go,
it is right here in
the seeds you sow.

as long as you say
I’m not yet done
life goes on
and so does fun.

Joys you read were,
springs that blossomed.
Joys you dealt were
Troubles you toppled! Routes are destined
through the choices
you favoured!
life is yours
so the vices and virtues

– Pragya {from the diary of May 2015}

पिंजड़ा

सरलता जटिल जब
हो सुगम हि दुर्गम
ये समकक्ष आये
कोई अंतर बताये!
मैं लौह युग में आया ,
एक पिंजड़ा बनाया
कुछ रंगीन बेचे,
कुछ काले खुरेचे
जो पर फड़फड़ाय
दीवारें टकराये।
फिर एक जिन्न बोला
बस इतना ही टोला!
वहीँ घर बसाया
बस उतना कमाया!
कभी हाथ बाहेर,
कभी पैर बाहेर
जेबें टटोली
हमेशा थी खाली।
बहुत लालची था
पिंजड़ों का माली।
एक बेजान चिड़िया,
धराशायी काया।
चली फिर सफ़र पे
तुलसी की छाया।

मेरा सत्व बोला
मैं मिटटी का चोला
पटक दी खुदाई
मैं दम्भी था मौला
मैं लौह का सृजक
पर मिटटी निवाला
ले ली ना मुझसे
मेरे जल की हाला!

– 14 अप्रैल, 2016
शुन्य अपने सिरों को समेटने का प्रयास कर रहा है कि जैसे उसे आतुरता हो लो -फिर चूहे को चूहा!

मुझसे मेरी बात नहीं होती

आज से बारह साल पहले लिखी एक कविता।

कहीं न कहीं मुझसे ही
मेरी बात नहीं होती वर्ना
ये उलझन
दिन रात नहीं होती।

नहीं होते ये एहसास
जिनके शब्द ही न हों,
नहीं होते ये पल
जिनमें, हम, हम ही न हों।

अंधेरे कमरे के
उस कोने में वो
बैठी अकेली
थी चीखती
अंदर ही अंदर
क्योंकि
आवाज सुन
कोई आयेगा!
शहर की भीड़ भाड़ में
जगह नहीं है
दौड़ कर कोई कहाँ जायेगा?

ऐसा कुछ न होता
जो मैं मेरे साथ ही होती
पिछले कुछ महीनों में
मुझसे मेरी मुलाकात हुई होती।
फिर ये खला दिन रात नही होती।

आज सोचा जो निकलूं
खुद को तलाश लेने
तो शब्द भटकते हैं।
कहते हैं
हम नहीं साथ उनके
जो हर लफ़्ज़ पर अटकते है।

– 04 मार्च 2006 ,12.3 AM
(दिवाली 2016 की सफाई में कुछ पन्नों से मिली।)
मैं उस वर्ष खालसा कॉलेज, दिल्ली विश्विद्यालय के द्वतीय स्नातक वर्ष के आखिरी सत्र में थी। मार्च का मतलब वार्षिक परिक्षा का महीना रहा होगा।