सरलता जटिल जब
हो सुगम हि दुर्गम
ये समकक्ष आये
कोई अंतर बताये!
मैं लौह युग में आया ,
एक पिंजड़ा बनाया
कुछ रंगीन बेचे,
कुछ काले खुरेचे
जो पर फड़फड़ाय
दीवारें टकराये।
फिर एक जिन्न बोला
बस इतना ही टोला!
वहीँ घर बसाया
बस उतना कमाया!
कभी हाथ बाहेर,
कभी पैर बाहेर
जेबें टटोली
हमेशा थी खाली।
बहुत लालची था
पिंजड़ों का माली।
एक बेजान चिड़िया,
धराशायी काया।
चली फिर सफ़र पे
तुलसी की छाया।

मेरा सत्व बोला
मैं मिटटी का चोला
पटक दी खुदाई
मैं दम्भी था मौला
मैं लौह का सृजक
पर मिटटी निवाला
ले ली ना मुझसे
मेरे जल की हाला!

– 14 अप्रैल, 2016
शुन्य अपने सिरों को समेटने का प्रयास कर रहा है कि जैसे उसे आतुरता हो लो -फिर चूहे को चूहा!