“सोचा न था” फ़िल्म 2005 में धीरे धीरे से आई थी और बहुत लोगों के दिलों में उतर गयी थी।
उसका सॉफ्ट टाइटल ट्रैक तब से आज तक वैसे ही पसंद आता है। इरशाद कामिल के बोल, संदेश शांडिल्य का संगीत साधना सरगम की आवाज़ गज़ब का जादू करते हैं न्यूरॉन्स पर। भागा दौड़ा सा मस्तिष्क अचानक से शांत हो जाता है।

साथ ही वीरेन के रोल में अभय देओल की बिना धूम धड़ाम वाली एक्टिंग बार बार देख कर वो देओल परिवार के ही हैं ऐसा दो बार सोचना पड़ा था।

अर्पिता को जब भी लगता था कि मेरा मूड कुछ ठीक नहीं है तो वो हमारे रूम में रखे कप्यूटर पे इस गाने को रिपीट प्ले लिस्ट में लगा देती थी । असर अच्छा रहता था। ये गाना गणित के प्रैक्टिस में भी डिस्टर्ब नहीं करता था।

आज भी ट्रफिक में चलते प्ले लिस्ट में ये गाना चल रहा है, इतना शोर है आस पास फिर भी इसके इतिहास और वर्तमान को सोचते हुए मैं मुस्करा रही हूँ।

कभी दिल के करीब
तुम्हें मेरे नसीब यूँ
लाएंगे सोचा न था
एक चाहत का पल
सब सवालों का हल
यूँ पायेंगे सोचा न था।

#प्रज्ञा 30 जुलाई