बेटा अभिज्ञान – भाग 2

इसको जी भर के शार्पनर कटर पेंसिल रबर
यूज़ करने देती हूँ।
जा जी भर छील जितने छिलने हैं ,
डॉम्स नटराज अप्सरा के रंग रोगन वाली
ग्रेफाइट की डंडियाँ ।

मैं किसी खास दिन के लिए नहीं बचाऊंगी ,
क्योंकि आज़ादी को वैसे भी सत्तर साल हो गए हैं
और मूल भूत सुविधाओं में तुझे
जब मर्ज़ी चॉकलेट खाने की आज़ादी दी गई है।

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मोक्ष प्रश्नोत्तरी

किसी एक जन्म के रिश्तों में ही
कुछ हिसाब बराबर करने जैसा
अटका के न रखें
तो मोक्ष मिल जाता होगा?

हाँ सौ टका मिल जाता होगा।

सिद्धार्थ को कैसे मिला होगा?

यशोधरा से माफी मांग कर।

किंचित।

और यशोधरा को कैसे मिला होगा?

वो औरत थी, उसका प्रामाणिक इतिहास नहीं है।

तो मतलब नहीं मिला होगा?

कह नहीं सकते, पर उसने ,क्षमा कर दिया था।

क्यों इसका क्या प्रमाण?

बुद्ध का निर्वाण।

तुम्हारे मत से बवाल होगा। तर्क संगत नहीं लगता?

क्यों नहीं लगता

साधू को गति,धर्मी कर्मी से मिलती है।एक स्त्री उसमें भला क्या कर सकती है।

पर गंगा तो जन्म देकर सात वसुओं को मोक्ष देती है।

गंगा तो माँ है!

स्त्री नहीं है?

अरे मतलब।

क्या?

ठीक है यशोधरा को मोक्ष मिला होगा।

कैसे?

स्त्रीत्व की सम्पूर्णता का भान कर के।

अब ये क्या है?

सर्व विदित है कि गौरी दैव्यै नम:।

00:58 29 अगस्त 2018

गौरैया फुदकती है – बाल कविता

गौरैया फुदकती है
चुनमुन चिरैया चहकती है
धीरे धीरे दाना डालो
सुबह सुबह क्यों जल्दी है
गौरैया फुदकती है।

कबूतर बनाये घोंसला
ले तिनके का हौंसला
चोंच दबाए उड़ते है,
डक्ट में चौकस रहते हैं,
स्लेटी पंख लाल आँखें
देखो कैसे अकचक ताकें
वहाँ दो बच्चे बैठकर
खाना मांगे चोंच पर
बच्चा खाये कौर कौर
मम्मी पूछे बेटा और?

गौरैया फुदकती है
चुनमुन चिरैया चहकती है
धीरे धीरे दाना डालो
सुबह सुबह क्यों जल्दी है
गौरैया फुदकती है।

Pragya Mishra

– 26 अगस्त की शाम अंशुमन को ट्राई साइकल की सवारी कराते कराते जो हम दोनों देखते गए उसे मैं बोलती गयी और ये सुनते सुनते अंशुमन ने सोसायटी के राउंड्स लिये।

दुत्कार के पुचकार

प्रेम की अभिव्यक्ति बड़ी कठिन होती है
गुस्साना, चिल्लाना, धकेल देना बेहद सरल
पुचकारने पर ” देखो कैसे नाटक कर रही है”
वहीं क्रोध को इज़्ज़त मिल रही है
इसलिए डाँट डपट आम चलन माना जाता है
और प्यार टाइम पास अनर्गल हरकत

नरमी रखने वाला व्यक्ति भीरू है
वो लल्लू है, उसे समय की समझ नहीं
वहीं कन्नी काट कर उल्लू सीधा करने वाला
स्मार्ट और रेलेवेंट।

अ के सामने अ जैसी बात करो
ब के सामने ब जैसी बात करो
स और द से बात मत करो
वो दिमाग लगा रहे हैं
वो तुम्हारा वक़्त बर्बाद कर देंगे
तुमको नए आइडियाज़ दे देंगे
तुम एक पैटर्न पे काम निपटाने की बजाय
सुधार की सोचने लगोगे और कितना
समय और पैसा दोनों लगने लगेगा
दिस इज़ द बॉक्स , इफ यू थिंक देन प्लीज़ गो आउट।

टिक टॉक टिक टॉक
मत सोचो कि सामने वाला इंसान है
सोचो कि उसका गला दबा देना तुम्हारा टारगेट
और उसकी साँस घुटना तुम्हारा प्रोमोशन
चाहिए कि नहीं चाहिए, चाहिए ना
तो फिर लगाओ ज़ोर,
तुम नहीं तो कोई और।
#प्रज्ञा 23 अगस्त 01:08 am

Pragya Mishra

दोहन ही राजस्व है

दोहन ही राजस्व है

लोनावला की घाटियों से
बस निकल पड़ी थी,
बड़े गौर से पेड़, पत्थर
और उनसे बने पहाड़ देखे,
वो कह हरे थे हम इतिहास हैं।
हमसे ये वादियां हैं,
वादियां हैं तो लोग हैं
लोग हैं तो पर्यटन ।

बड़े ह्रदय से मानव जाति का आलिंगन किआ
अतिथि के सत्कार में सीना चीरने की आज्ञा दी,
नहीं दिया तो हक़ जाता के मशीनें चलायी,
जैसे वसीयत में मिले हों ।

बहुत खूबसूरत बहुत लाजवाब !
बोल कर आदमी पास और पास जाता गया।
नयनाभिराम दृश्यों की चाह में
कुकुरमुत्ते की पैदावार से घर उगाये।
मशीनें, उठता धुंआ, कंक्रीट, रसायन थोप दिए।
जागीर है और देश स्वतंत्र ।

वाशिंदों को आनन्द मिला,
सैलानियों को बढ़ावा ।
दोहन ही राजस्व है।
जो न मिली तो वादियों को इज्ज़त और जमीन को मिट्टी।
समय के साथ सबकुछ जरूरतों का कचरा है।

सैकड़ों चीटियाँ चढ़ के आदमी को चट कर जाएं
तो आदमी मिट्टी हो।
उसपे निर्भर परिजन पेे न जाने क्या बीती हो।
हज़ारों इंसान प्रकृति पे लपके ,
क्या उसकी आप बीती हो?

हमारा इतिहास हरा था।
हमारे बचपन में जंगल थे,
पेड़ों पे झूले ।
स्वच्छ झरने,
हर तरफ पहाड़ ।

बेटा अब हालात वैसे नहीं रहे
क्षेत्र में विकास भारी है।
काबिले तारीफ सड़कें हैं,
भूस्खलन बचाव की तरफ काम जारी है,
रास्ते में आने वाले पेड़ों को
आपत्ति प्रमाण पत्र दिए गए।
काबिल शेड सड़क किनारे तैयार किये गए।
अल्मुनियम में चमक है,
झरनें बोतलों में बंद हैं,
रिसते रसायनों को मात दे दी
मशीन से साफ पानी निकलता है।
प्रगति ने सीमाएं तोड़ दी।
अब आदमी पहले कान काटता है,
फिर कोशिकाओं से जनमाता है।
बड़ी खोज़ों वाला मनुष्य
धरती को पट्टी पढता है।

Pragya Mishra

बेटा अभिज्ञान

बेटा ,
कहते हैं सोने से ठीक पहले
दिमाग में वो ही
बातें आती हैं
जो हम सबसे ज्यादा करना चाहते हैं ,
और रोजमर्रा की जरूरतों को
पूरा करते हुए नहीं कर पाते हैं।

मैं कल तक कभी देखा करती थी
मैं हूँ मंच है और बाकी के शौक
पर बेटा आज कल कुछ दिनों से
न धुन आती है न शौक
ख्याल आता है
तुमसे बात नहीं हुई
तुमको निहार नहीं गयी
डाँट कर उठाया
धक्के से नहलाया
स्कूल भेजा जैसे तैसे
खुद भागी जैसे तैसे
फोन की पूछताछ थोड़ी सामने से हो पाती तो
काश मैं भी बस नीचे यूँ ही तुमको
खेलते देख पाती तो
इतना सा शौक तुम्हारा
की मम्मी बैठी रहे
मेरी पानी की बोतल पास लेकर
मैं पूरा कर पाती तो।

मैं क्या कर लूंगी एवेंजर के खिलौने देकर
वो टूट के कचरा हो जाते हैं।
पर तुमको वो थोड़ी देर की खुशी तो दे जाते हैं
लेकिन ये चिड़चिड़ाहट कम नहीं करते
जो माँ के साथ बैठने से कम होती है
ये झुंझलाहट कम नहीं करते
जो तुम्हारी मीठी प्यारी बातें सुनने से कम होती है
तुमने ध्यान नहीं दिया है अब तक
क्योंकि तुम बहुत बच्चे हो।

वो 2016 का मार्च रहा होगा
तुम पूरे परिवार को एक साथ अलविदा कहने
तस्वीर खिंचवाने नहीं आये थे।
सबके सामने बड़ी जिद पे अड़कर
किसी बात पे जो गुस्सा के भाग आये थे
बहुत आक्रोश सा दिखाया बड़ों के सामने
बिगड़ गया पूरा कहलाये थे।
मैंने बहुत तेज़ मारा था
उस हरकत पर
तुम रोकर चुप हो गए
थोड़ी देर सुबक कर।
मुझे मेरा सबक दे गए
क्यों किया एक पांच साल के बच्चे ने ऐसा
मुझे सोचने पर मजबूर गए।

और आज का दिन है
दो साल से ऊपर होने को है
बिना कुछ सीखी तुम्हारी मम्मी
हर दिन सीख रही है
तुम्हे पालना ।
और सोचती है तकिये पर सिर रख
क्या कैमरों से देखते देखते
मैंने तुमको कम देखा?
तस्वीरों को खींचते हुए
खिंचती लम्बाई को कम देखा?
तुम बिन सिखाये साइकिल सीख गए
आज गलते ग्लेशियर की तस्वीर देखकर
बिन बताये समझ गए कि
“ऐसे तो मम्मी हमारी धरती डूब जाएगी”
कितने समझदार हो तुम बेटा
अपना भविष्य ग्लोबल वार्मिंग में डूबता देख सहम गए
इस समझ तक हमको आने में कुछ सौ वर्ष लग गए

देखो बेटा क्या हालत क़है!
केरल में कैसी आफ़त है!
पर मम्मी कल फिर ऑफिस जाएगी।
फिर वैसे ही चिल्लाएगी।
और तकिये पर सर रख रात में
यही सोचती जायेगी
क्यों करते हैं हम सब ये सब
क्यों न रहें बस साथ उन्ही के
छूट जाता है जिनका साथ जब तब।

धरती पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
मैं भी पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
क्या दे रही हूँ तुमको
घिसते कदम और स्कूल का बस्ता
हर दिन कुछ घण्टों में फोन घुमा के
समय छह बजे से पहले खाने का वास्ता?

दादी माँ कहती थी
खाना जो प्यार से नहीं जाता
वो देह में भी नहीं लगता
भरसक तुम पतले लगते हो।

क्या कर गुजरने की छटपटाहट में बढ़े जा रही हूँ?
तुमको जी भर गले न लगाने में भी बिलबिला रही हूँ।
कभी इस पे निकलती है तो कभी उसपे ।
मुझे भी समझ नहीं आता कि भड़ास किस बात की?

पर ये जो केरल में आई बाढ़ है ना बेटा
वो मुझसे ये सब लिखा रही है।
बेमतलब पानी पैर तक आ गया है
जड़ें उखड़ रही हैं
पेड़ सर पर तैरने लगे
तिनके सा सिलेंडर बह रहा है
हम करोबार में डूब रहे हैं
बिजली काट दी गयी
न कोई सम्पर्क है न साधन
नानी से छुट्टीयों में चिट्ठी लिखने की कला भी नहीं सीख पाए
जब तक रौशनी थी कुछ बनारसी साड़ी के प्रिंट सा
हाथों पे मेहंदी लगाना सीखते रहे
पहले कलम से कॉपी पर
फिर सब बाढ़ के पानी में बह रहा है।
घर,नौकरी, पहचान, सब
बाढ़ के पानी में बह रहा है
दरअसल ये त्रासद नहीं है बेटा ,बस करवट है
ऐसी करवट तुम मत लेना।

#प्रज्ञा 4.00 am 18/08/18

एक लिखी कविता

एक लिखी कविता

कविता प्रेम रचते रचते निर्गुण हो जाती है
फिर पवित्र अग्नि में बदल जाती है
जिसमें राग स्वाहा हो जाता है
और मन कुंदन।

कविता सच कहते कहते साधू हो जाती है
और फिर समाधि में लीन किसी योगी
की तरह देह छोड़ कर
ढूंढने लगती है तत्व।

कभी देशभक्ति का स्वर, कभी भक्ति में चौपाई
कभी नारे, कभी राजनीतिक पार्टियों की दुहाई

कविता शैली भर नहीं रह जाती
वो मात्र छंद से छंद का मेल नहीं होती
वो बचपन में स्मरण की शक्ति का मानदण्ड होती है
युवाओं में व्यवस्था के विरुद्ध रक्त का ओज
प्रौढ़ावस्था में परिवार के नाम सन्देश
तो अवसान में कण्ठ से उतरती गंगा जल की अनुभूति

कभी कभी लेखनी इसे वैतरणी मान चलने लगती है
भाव विह्वल बेड़ियों से मुक्त होकर ठौर मिल जाएगा
या पार ही लगा जाएगी
एक लिखी कविता
हर बार
और न जाने कितनी बार

Pragya Mishra
#प्रज्ञा 15 अगस्त 11.50pm