पेड़ का रंगीन तना

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पेड़ का रंगीन तना

एक पेड़ बड़ी ऊंचाई से
अपनी जड़ें तलाश रहा था,
बीच के छोटे सतरंगी पत्ते
किसी भी दिशा में बढ़ चले थे।

सिरा झुकने लगा था,
जड़ें छिपने लगी थीं।
डालें टूटी पत्ते बिखरे
एक उम्र हो चली थी।

उस दिन सड़क किनारे
चलती इंसानी पैदायिश ने
उसे गैर जरूरी समझा,
कह रहे थे कोई फंगस आया है।

जड़ें अब भी हैं,
पेड़ कट चुके हैं।

किसी दिन नए चलन के
कुछ कलाकार आये,
कटे पेड़ों को इज़्ज़त बराए।

रास्ता छापते रंगीन तने
जुहू के समानांतर दौड़ते हैं।
यूँ तो वहाँ छाँव नहीं है,
लोग कला की तारीफ करते हैं
और शायद पेड़ भी,
अपनी सुन्दर समाधी के लिए।

– प्रज्ञा ,दिसंबर 2015, पेड़ का ताना।