उलझन सुलझन

अंतर्मुखी और बहिर्मुखी
एक साथ होना भी
अजीब परेशानी है

कभी तो एक  साँस में
भीड़ सम्भाल लेना
कभी  खुद भीड़ में
कहीं खो जाना
जैसे नाते हैं न धाम
बस की खिड़की पे
केहुनी टिकाये
उँगलियाँ चलती रहती है
मानो सितार बजाया जा रहा हो

#प्रज्ञा