दोहन ही राजस्व है

दोहन ही राजस्व है

लोनावला की घाटियों से
बस निकल पड़ी थी,
बड़े गौर से पेड़, पत्थर
और उनसे बने पहाड़ देखे,
वो कह हरे थे हम इतिहास हैं।
हमसे ये वादियां हैं,
वादियां हैं तो लोग हैं
लोग हैं तो पर्यटन ।

बड़े ह्रदय से मानव जाति का आलिंगन किआ
अतिथि के सत्कार में सीना चीरने की आज्ञा दी,
नहीं दिया तो हक़ जाता के मशीनें चलायी,
जैसे वसीयत में मिले हों ।

बहुत खूबसूरत बहुत लाजवाब !
बोल कर आदमी पास और पास जाता गया।
नयनाभिराम दृश्यों की चाह में
कुकुरमुत्ते की पैदावार से घर उगाये।
मशीनें, उठता धुंआ, कंक्रीट, रसायन थोप दिए।
जागीर है और देश स्वतंत्र ।

वाशिंदों को आनन्द मिला,
सैलानियों को बढ़ावा ।
दोहन ही राजस्व है।
जो न मिली तो वादियों को इज्ज़त और जमीन को मिट्टी।
समय के साथ सबकुछ जरूरतों का कचरा है।

सैकड़ों चीटियाँ चढ़ के आदमी को चट कर जाएं
तो आदमी मिट्टी हो।
उसपे निर्भर परिजन पेे न जाने क्या बीती हो।
हज़ारों इंसान प्रकृति पे लपके ,
क्या उसकी आप बीती हो?

हमारा इतिहास हरा था।
हमारे बचपन में जंगल थे,
पेड़ों पे झूले ।
स्वच्छ झरने,
हर तरफ पहाड़ ।

बेटा अब हालात वैसे नहीं रहे
क्षेत्र में विकास भारी है।
काबिले तारीफ सड़कें हैं,
भूस्खलन बचाव की तरफ काम जारी है,
रास्ते में आने वाले पेड़ों को
आपत्ति प्रमाण पत्र दिए गए।
काबिल शेड सड़क किनारे तैयार किये गए।
अल्मुनियम में चमक है,
झरनें बोतलों में बंद हैं,
रिसते रसायनों को मात दे दी
मशीन से साफ पानी निकलता है।
प्रगति ने सीमाएं तोड़ दी।
अब आदमी पहले कान काटता है,
फिर कोशिकाओं से जनमाता है।
बड़ी खोज़ों वाला मनुष्य
धरती को पट्टी पढता है।

Pragya Mishra

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