बेटा अभिज्ञान – भाग 2

इसको जी भर के शार्पनर कटर पेंसिल रबर
यूज़ करने देती हूँ।
जा जी भर छील जितने छिलने हैं ,
डॉम्स नटराज अप्सरा के रंग रोगन वाली
ग्रेफाइट की डंडियाँ ।

मैं किसी खास दिन के लिए नहीं बचाऊंगी ,
क्योंकि आज़ादी को वैसे भी सत्तर साल हो गए हैं
और मूल भूत सुविधाओं में तुझे
जब मर्ज़ी चॉकलेट खाने की आज़ादी दी गई है।

रविवार की सुबह सुबह हम तुझे
आइसक्रीम ना खाने के पॉइंटर नहीं गिनाते हैं
और मंदिर ले जा कर सरेंडर भी नहीं ही कराते हैं,
तो फिर लाल गुलाबी डंडियों की
छाल को घुमाते रहने देने में क्या ही हर्ज़ है।

बस छोटी हो जाती हैं पेंसिलें निर्थक कटते रहने से,
अभी फेक देते हो क्योंकि समझ नहीं है
थोड़ा सोच फैलेगी तो देखोगे जहां काम आवे सुई
तन्नी गो पिंसिल कंपास में बढियाँ फिट हुई।

कितने तरह के इरेजर्स तुम्हे चाहिए भर लो मन
ताकी ललक टेलिस्कोप के लिए बची रहे
किसके पेंसिल बाक्स में क्या है उसमें मन ना बहे।

सब कुछ तुम्हें तुम्हारा अपना दिया जाएगा,
लेकिन एक कमरे में मेरे साथ ही सो रहो अभी
एक दिन तो तू बड़ा हो ही जायेगा।

तुम्हारी अलमारी अलग,
किताब के ताखे अलग,
अलग बैठक ,
अलग रखी है स्टडी
लेकिन बेटा –
“प्लीज़ ग्रो अप लिल स्लो एंड स्टेडी।”

मेरे दिन नौ घन्टे से बारह के हो जाते हैं
हफ्ता महीना साल तिमाही के हो जाते हैं।
नहीं होता है तो एक टक देखना
की अब गेंद तुम्हारे बल्ले से कैसे शॉट खाते हैं
स्टाइल तुम्हारा , हैबिट्स, कुछ शब्द
रोटियाँ सेकते सेकते मेरे कानों तक जाते हैं।

ठुड्डी पे चोट लगी थी
दिखा ही नहीं मुझे
तब तक जब तक
आज क्लास मिस हुआ
बताया गया मुझे
उस समय तुमको पकड़ के
कितनी लगी
कैसे लगी
नहीं पूछा मैंने
रहती तो ऐसे होता कर
रहती तो वैसे होता पर
गुस्सा आया मुझे,
गुस्सा आया मुझे।

ये अक्सर आता है
और तुम इतने काबिल दार की
हामी में मुंडी हिला हिला कर
चट चट पूरी दूध रोटी निपट देते हो
बैग जगह पर धर देते हो
ठंडे पानी से भी नहा लेते हो
बटन ऊपर नीचे ही सही
बस के छूटने लटकने तक
पूरा तैयार हो लेते हो
मैं उस पर भी हिसाब बंद नहीं करती
नहीं कर सकती
मेरे फेफड़ो में सांस नहीं
कार्बन भर रहा है
बहुत काला
शायद दिल तक पहुंच गया है।

तुम पर छोड़ देती हूँ
तुम कर लेते हो।
सोचती हूँ कैसे थोड़ा अपने
स्वार्थ में ही तुम्हे स्वावलम्बी
न बनने दूँ।
ममता की खुराक का
दाना पानी बचे रहने दूँ।

पर घड़ी आड़े आ जाती है,
गाड़ी आड़े जाती है,
पहिया आड़े आ जाता है,
जिसे काँख फसाये,
जांघ दबाए एक पैर से,
हाँके जाना है , हाँके जाना है।
स्टैंडर्ड सुविधा वाला
तगड़ा जीवन टिकाते जाना है।

बेटा साँचा शायद रेक्टेंगल का था
देखो कितना पढ़ लिख कर
मम्मी ट्राइंगल फिट कर रही थी।
नहीं मैं तुम्हे जाँच नहीं रही थी,
फिर भी तुम ऐसे दिखाते रहे
कि मम्मी कुछ सोच समझ के ही कर रही थी।

बचपन में बड़प्पन जीना अच्छी बात नहीं है
बड़प्पन में बचपना हुआ जाता है।
जितने खाली घर में फलांग नहीं मारी
उनपे ही मन चला जाता है
ये नहीं याद रहता की घर तुम्हारा थोड़े था
इसलिए तुम्हारे हिस्से का जितना
आज में जायज़ है
सब कुछ तुम्हे रूचि पूर्वक दिया जाता है ।

Pragya Mishra

30 अगस्त , मुम्बई

2 thoughts on “बेटा अभिज्ञान – भाग 2

  1. जीवनदात्री और जीवन के बीच का सुरम्य संबंध।
    जीवन के जीवन को जीवंत रखने के लिए जीवनदात्री के

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