झपकी कहानी -2

“मम्मी वो प्लूटो से पढ़ो न आज।”

बड़े दिनों बाद हमने सोने से पहले प्लूटो निकाली।
अभिज्ञान को प्लूटो मैगज़ीन की चित्रकारी अच्छी लगती है।उसकी छोटी कवितायें , टू लाइनर्स उसे मज़ेदार लगते हैं।

पाखू और बजरंगी मासूम हैं साथ ही बुद्धिमान भी, उनका तर्क बिल्कुल सही है कि क्यों अपने मन की करने वाला उल्लू कहलाता है।

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अंशुमन की सीख

अंशुमन बोलना सीख रहे हैं, समय के साथ मैं ये भूल जाऊंगी की उन्होंने कौन से शब्द को कैसे बोलना शुरू किया इसलिए ये जरूरी है कि इस प्यारी याद को मैं लिख कर स्थायी कर दूँ। बोली कि तस्वीर नहीं ले सकते उसको रिकॉर्ड कर सकते हैं लेकिन रिकॉर्ड करने जाती हूँ तो अंशुमन मोबाइल पकड़ के टच की काबिलियत सीखने लगता है।

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हल्की ठंड में

हवा में हल्की ठंडक आ चुकी है । हम अभी अभी विश्वकर्मा पूजा के अवसर पर मशीनों की पूजा कर आये।थोड़ी देर से हुई, मैं ऑफिस में थी और मुझे भी साथ जाना था।

हवा की हल्की ठंडक मुझे दशहरा और दीवाली
याद दिलाते हैं। खूब सजधज कर यहाँ शॉल लपेटने की जरूरत नहीं पड़ती, बिहार में पड़ती थी।

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साबूदाना खीर

तब मेरे पास स्मार्ट फोन नहीं था, किसी के पास नहीं था। कैमरा कोडक का था। जिसमें रील तब ही भरते थे जब कहीं बाहर जाते थे या किसी का जन्मदिन , कोई अन्य पार्टी होती थी। डिजिकैम भी दादी माँ के रहते आ गया था। लेकिन हमारे पास नहीं आया था ।मैंने सोचा भी नहीं कभी । वो कोई कमी थोड़े थी।

मैं तो गहना बेटा थी, दादी माँ फटाफट बाड़ी से जाकर भिंडी तोड़ती थी, चट से कड़ाही में भूज कर गरम रोटी के साथ देती थी। भिंडी पकी भी रहती थी, हरी भी रहती थी। किसी को दिखा नहीं सकती रेटिना में है, निकालने की तकनीक डेवेलप होगी तो देखूंगी।

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