नीला है चंद्रमा

नीला है चन्द्रमा

मतभेदों के बावजूद भी फिक्र रहती है
वो आएगी तो क्या खाएगी,
बिस्तर ठीक तो है ,
कमरा थका तो नहीं लग रहा
सोचती रहती है
अपने स्तर पर ।

तुम्हारे आराम की परवाह करेगी
बिना अपनी सोचे हुए
बस लिए एक इच्छा
की छोटी सी तारीफ आये।

न आये तो भी हँसेगी।
किसी देसी मुहावरे के साथ ही,
उम्र के बीच का फासला पाट देगी।

पर हम भारतीय प्यार नहीं जताते
उसपर से बिहारी,
जो गले भी नहीं लगाते।
हूँ हूँ की हामी में जाया कर देते हैं
ज़िन्दगी के सत्तर साल।
थोड़ी थोड़ी कड़क तरेर कर
उसमें भी फिक्र थी,
हमारे दादे परदादों की ही तहज़ीब थी।
थोड़ी थोड़ी बच्चा तोड़ रहा है
थोड़ी थोड़ी दादी तोड़ रही है।

बहू को गर्म गुजिया पसन्द है,
बिना कुछ जताए बना के रख दी गयी।
बाबूजी जो कुछ ले कर आ गए
वो सब्ज़ी फिर तभी बनी।
बेटा जब भी घर आया
थाली गर्म मिली ।

रिश्तों में ब्याह के वो औरत
बहुत कुछ हो आयी।
चाची मामी पीसी
और सुखसेना वाली कहलाई।

लेकिन उसके पूरे आवरण में
बस माँ है सबकी माँ!
इनको ना आदत होती है,
दुनिया की फिक्र लेने की
ये बैठती नहीं हैं!
ये माँ होकर अमर होने को चलीं हैं।
ये औरतें कौन हैं
ये कैसे बनती हैं
तुम बात करते हो महिला शसक्तीकरण की
इनसे आओ पूछो
बात करो साठ सत्तर अस्सी नब्बे
ये कैसे गीता बनती हैं।

इन्होंने चौखट पर हुंकार भरी है
गुंडे डराए हैं, पल्लू में समेटे
अपना चेहरा मकान को घर,
कमरों से तल्ले दो तल्ले स्कूल बनाए हैं।

तुम्हारी मचलती हाई हील बयानी
अगर इसको बकर लगती है
तो है कुछ बात
उसे जगह दो
ये वो है जो अपनी घर की ईंटों
की मिट्टी अपनी पीठ पर लाती है
हाथ से थोपती है,
सीमेंट से भी पक्का बनाती है।

चली आ रही है
कितने चल बसे ।
चली आ रही है
कितने उक्ता गए।

क्या है वो बात जो
बन कर जिजीविषा
ज़िंदा रखती है ?
ममता है, माँ है।

वो पचास वर्षीय बेटे
घर की बहू बेटी
नाती पोते पोती
सबको अपनी ममता पर
निर्भर देखती है
सबल रखती है
अपना शरीर
वो होती नहीं दुर्बल
जरा के आगे भी।

प्रज्ञा मिश्र

2 thoughts on “नीला है चंद्रमा

  1. बहुत ही भावपूर्ण रचना। एक एक दृश्य आँखो के सामने उतर गया। आपने सशक्त महिला का वो रूप सामने रखा जिसको आज के समाज मे कमजोर देखा जाता है। बहुत ही मर्मभेदी कविता।

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