महेन्द्रू

सोचती हूँ चलने से पहले हो आऊँ
हर उस गली से जहाँ से शुरुआत हुई थी ,
जब देखती हूँ तो याद नहीं आता
मैं बचपन में कहाँ कहाँ गयी थी।
ये कुछ रंगोली सी तमन्नाओं वाली
ज़िन्दगी जो जन्म लेते से पचीस की हुई।
फिर पालने वाले क्या खूब मिले,
किसी से कोई शिकायत ही न रही।
न किताब खुलते से पिनोकीओ खड़ा होता है
न स्याही कॉपी पे फैलती है
न दीवार से टँगे संतरों में पेनीसीलीन
के हरे फंगस लगते है
न कपड़े दिल्ली से आने तक बिस्तर पर
महीनों पड़े मिलते हैं
न कोई लिखता है धड़ाधड़ धड़ाधड़
कुछ न बोल पाने की छटपटाहट में
न डेढ़ दिन के गीले कपड़े सड़े महकते हैं
अव्यवस्था से ही प्रेम हो जाये तो
व्यवस्था में भी मन अव्यवस्थित रहता है
वैसे भी अब उस मकान में कोई नही रहता है ।

यादों की परत

हर साल दीवाली की सफाई में यादों की परत से धूल हटायी जाती है। उन सारे बेहतरीन दोस्तों को याद किया जाता है जिनके साथ शामें बेफिक्र थी। वो आज भी बिना मतलब याद करते हैं, बताने की फुरसत तो मेरे पास भी कम है।डायरी को तीन बजे वाली धूप में रख दिया है।

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अभिज्ञान उवाच

22 अक्टूबर 2018

अभिज्ञान उवाच

आज फिर खेल कर आने के बाद मेरे छह वर्षीय सुपुत्र
अभिज्ञान मोज़े खोलते हुए नज़रे नीची किये बहुत आई-एम-डन की तरह से बोले:

“मम्मी ट्वेंटी सेवेन ओक्टोबर को हमारी छुट्टी हो रही है उसके बाद मुझे ऑस्ट्रेलिया जाना है। फिर यू एस ए।”

ऑफिस से घर आने के बाद मैं डिनर टेबल पर भात और सरसों-सोहिजन-आलू की सब्ज़ी मज़े मे खा रही थी। उसके वाक्य पर , मैं और अन्य सदस्य व्यंग्यात्मक शैली में उसको देखने लगे।बोले कुछ नहीं। सोहिजन स्वादिष्ट था।

दूसरा मोज़ा खोलते अभिज्ञान और व्यथित होकर बोला:
अरे मेरा पासपोर्ट ही नहीं बनाए कोई , पापा कुछ करते क्यों नहीं।

अबकी दादी थोड़ा हँसी। पुचकार कर कल ही ले जाके बनवा देने का ढाँढस मिला।

अभिज्ञान फिर बहुत गम्भीरता से ठुनकते हुए बोले:

“अरे आप लोग समझते नहीं, मैं कहीं नहीं जाता। मैं जयपुर नहीं गया, राजस्थान नहीं गया, पाकिस्तान नहीं गया , नागपुर भी नहीं गया। मैं कहीं नही गया। मैं बस दिल्ली जाता हूँ दिल्ली ।”

हँसते हुए दादी बोली – की भेलौ? कथी सब पढ़ा दै छौ सब कियो तोरा ? (संगत के संदर्भ में)

सब उसे एकटक सुन रहे थे, हँसने का साहस बस दादी और छोटी दीदी में था क्योंकि वे ही उसको बाद में प्यार से समेटती भी हैं। मेरा हँसा या पट्टी पढ़ाया उसको पचता भी नहीं और जमता भी नहीं शायद- ” एक तो जरा सा मिल रही हैं उसमें भी चालू” ।
तो मैंने सरसों-सोहिजन-आलू पर कंसन्ट्रेट किया। इसमें भी रस था, उसमें भी रस था , बात चबाने के लिए चावल का भूजा साथ हो लिया।

डिमांड पर फ़ैसला पापा के फ्रेश होकर आने तक चला।

फिर सब रफा दफा करने का यंत्र टी.वी. थोड़ी देर चला ।

टीवी बन्द होने तक महत्वकांक्षा और प्रश्न दोनों चले गए।

मेंटल मैथ के प्रैक्टिस पेपर से गुडनाइट हुआ।

#आमआदमीकाबच्चा

इन रास्तों का पैटर्न नहीं है

इन रास्तों का पैटर्न नहीं है

मैं देखती रहती हूँ आने वाले पल को की
कैसे मुड़ता है चलता है लेकर मुझको बहाने से
बचपन में गोद लिए टॉफी दिलाता सा
रंग बिरंगी किताबो से मेरा मन बहलाता सा।
झील झरने पहाड़ दिखाए
और अचानक रेगिस्तान ले आया
पर ऊँट की सैर न करा पाया।

खूब जुगत रही कि अब ऐसा होता जाए
की तब वैसा होता जाए
होता वही गया
जिस रास्ते हम अपने घर आये।

घर क्या आये की ये भी नया सफर ही था
अब पिछली सीट में बैठे
बस ज़िन्दगी को देखना नहीं था
ये वही समय था जिसमे ढूढने पड़ते है
बहाने तुम्हें पास बुलाने के
तुम्हारे पास आने के ,
क्योंकि बगलवाले से बात करते तुम मुझे
अपनी गोद से उतार चुके थे।
उसके बाद अपनी फिर मेरी
ज़िम्मेदारियों की लंबी फेहरिस्त
का एक अनंत झूला डाल कर
मुझे उसमें पाल कर
झूमते कभी के तुम जा ही चुके थे।

नींद आयी , कोई आया
मुझे उठाने बताने की
एक उम्र हुई अब
तुम्हे आगे बढ़ना चाहिए
घूमे तो
बस थी
बस स्टैंड था
और ठीक समय था
बस के जाने का
इस बार कभी न मुड़ने के लिए
जिन्हें जाना था वो चले गए
समय ने पीठ सहलाई
मैं इस बार थोड़ा दूर छिटक आई

सफर में ये रास्ते कोई उपाय नहीं देते
निकल चुकी गाड़ी के टेढ़े निशान
मिटाने के लिये
शायद कुछ बातें होती ही हैं घटित
लिख लिख कर भूलते जाने के लिए

प्रज्ञा 22 अक्टूबर 2018

अश्मिता

अश्मिता

तुम्हारी जीत भरी मुस्कराहट को
देख कर हमेशा ऐसा लगता है
जैसे कितनी मुश्किलें
अपनी सैंडल से मसल कर
कभी धीरे तो कभी तेज़ चकलर कितनी
गिरहें तोड़ती आयी हो।

हाथ कमर पर
होठों पर हँसी
जैसे झंझावातों का
शो बिज़
करती आई हो।

“आई एम हियर टू स्टे!”
आईने को बोला कितनी बार ।
आँखों की कोर
को ज़िद बना कर
हँस के पोछा कई बार।

बोलती कुछ नहीं आँखे
ज़िद्दी बहुत हैं तुम्हारी
सुनाने कुछ नहीं देता
स्वाभिमान भी तुम्हारा।

कितनी सादा हो
कितनी खूबसूरत
तुम्हारे माथे पर
जो बल पड़ा है
सोचता सा मन
तुम्हारा सिंचित प्रेम
हैं सब ।
अपने अनवरत होने को
अपनी निरन्तरता
में सोचती नहीं होगी तुम
बस करती रहती हो
सारे ज़रूरी काम
खुद को भूल के हरदम।

अस्मिता – [सं-स्त्री.] –
1. अपने होने का भाव;
2. हस्ती;अपनी सत्ता की पहचान
(पहली बार अज्ञेय द्वारा’आइडेंटिटी’ के लिए शब्द ‘अस्मिता’ प्रयुक्त)
3. अस्तित्व; विद्यमानता; मौजूदगी

#प्रज्ञा

स्व का बोध

स्व का बोध, कैसे होगा?

आज बहुत दिन के बाद सोशल मीडिया में कुछ देखने का मन नहीं है। पिछले नौ दिन का व्रत पाठ हवन इतनी तैयारी, गरबा, तस्वीरें तस्वीरों की परतें उनपर बनी कहानियों से मन निकल कर सन्तुलन ढूंढ रहा है।

कल कोई इंतज़ाम नहीं करना। एक साधारण शनिवार होगा। यूँही बैठ कर सहज समाधि का प्रयास करना एक अच्छा विचार लगा। तब तक जब तक पैर सुन्न होकर चलने लायक न रहें और दिमाग की खोह अनंत में एक गली जाती रहे ,अंत का प्रकाश खो जा रहा है, अभिज्ञान अपने मोज़े ढूंढता है, ऐसा मोज़ा ढूँढ रहा है जिसमें छोटी छेद है क्यों?

टाइपराइटर के बढ़ते सीरे को खींच कर फिर निरुत्तर छोड़ दिया, ये पश्न आवश्यक नहीं है।

अभी शून्य आवश्यक है, कम से कम उसके जैसे हो जाने की अवस्था तो होनी चाहिए।

कुछ नहीं सोचने के प्रयास में अचानक स्व के बोध का विचार आया।इसको शून्य कैसे कर दूँ?

स्व का बोध अपनी भाषा में होगा?

नहीं स्व का बोध उस भाषा में बात करने से होगा जो विचार में पहले फूटती है।

तो क्या वो कोई भी भाषा होगी?

हाँ।वो सोचने की भाषा होनी चाहिए।हमारे व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होने से ही स्व का बोध हो सकता है।

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कैसे होता है?

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास तब होता है जब हमारी सोच की भाषा पर बोली और लेखन दोनों में मज़बूत पकड़ हो और उसे बोलने उसमें अभिव्यक्त करने में हमारी झिझक शर्म जैसी भावनाएं निर्थक हो गयीं हों।

तो क्या भाषा पे पकड़ स्व का बोध कराएगी?

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम होती है । वो स्व का बोध कराने में सहायक मात्र होती। अच्छी अभिव्यक्ति के कारण मन कुंठाओं से मुक्त हो सकता है ।मस्तिष्क स्वतंत्र रहता है। मन, तरह-तरह की दैनिक घटनाओं को लेकर ऐसा बोल देती, वैसा बोल देती, यही अच्छा होता, काश वो बोल देती करते हुए अपनी भूतकाल की मानसिक अवस्था का दास नहीं बना रहता।स्वतंत्र मस्तिष्क शान्त होते हैं, चेहरे पर सौम्यता आती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।आत्मविश्वास बढ़ने से किसी से कुछ छुपाकर करने की आवश्यकता जाती रहती है, अचानक कोई आ जाये हम कुछ करते रहें उसमें धक्क नहीं उठती की क्या सोचेंगे क्या बताएंगे वगैरह क्योंकि एक तरह से समक्ष परोक्ष एक जैसे हो जाता है हम स्वयं अपने आप से पश्न करने लगते हैं कि क्या तुम्हें ये करना उचित है -तो

हाँ में डर नहीं और ना में कर नहीं।

मेरे पापा के जीवन भर के कई संचित सिद्धांतों में से एक है यह।

तो क्या स्वंतन्त्र मन और आत्मविश्वास ही मूल हैं?

हाँ, ये मुग्ध प्रसन्नचित मन के स्त्रोत हैं । ऐसे व्यक्तित्व के लोग निखरने लगते हैं। एक तरह की आभा उन स्त्री पुरुषों के मुखमण्डल पर आने लगती है जबकी स्व का बोध तो हुआ भी नहीं है। अभी तो वे बस यात्रा में हैं।
ये कांति उनके शरीर की कोशिकाओं से आती है जो की स्वास्थ्य से बढ़ रही है , जिसका मूल था आत्मविश्वास के साथ स्वयं को अभिव्यक्त कर पाने को क्षमता।

तो अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हारी अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है।

स्व के बोध में और भी कई बातें शामिल हैं , जैसे पश्न करना, निरन्तर पश्नों के हल ढूंढते रहना , कोई काम इसलिए नहीं करना क्योंकि उसे तुमसे कहा गया है। उसकी तह तक जाना कि मैं ये क्यों कर रही हूँ इसका लाभ किसको , इससे क्या क्या बातें आगे काम में आती हैं वगैरह, तो मतलब स्व के बोध के लिए सन्त बनना आवश्यक नहीं है पश्न करना आवश्यक है, सौम्य सार्थक पश्न।

मनुष्य जन्म के साथ नाड़ यूँ तो काट हटा देते हैं डॉक्टर पर असल में वो बेहद उलझी हुई हमारे शरीर के चारों तरफ चिपक जाती है समाज में फिट होने का डर बनकर औऱ मौलिकता जिसके बीच बीच के गाँठों में बेहद सुरक्षित रखी होती है जो कभी तो मिलती नहीं लेकिन ढूँढते रहने से कुछ गाँठे ही खोल पाते हैं।

देखा यही गया है कि एक सिरा पकड़ कर जो अपने आप को खींचता गया खुद को समेटता गया है उसको मौलिकता की सूत मिली । जैसे कोई संगीत को लेकर, कोई लेखन को लेकर , कोई अपनी किसी कला पद्धति के कारण । ख्याति प्राप्त सिद्ध व्यतित्व ने हमेशा मेहनत की ,जिस किसी भी क्षेत्र में हो जैसे – गणित , विज्ञान, कला इत्यादि। एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाए। ऐसे लोगों की मेहनत की विधा निर्णय लेने की क्षमता से निर्धारित होती है। जिसकी पुष्टि आत्मविस्वास करता है और आत्मविश्वास एक बार फिर अच्छी अभिव्यक्ति से बढ़ता है। इसलिए एक भाषा का अच्छा और पूरा ज्ञान स्व बोध की यात्रा के लिए बेहद आवश्यक है।

इन सब बातों से ये ज्ञात हो रहा है कि स्व का बोध होना असलियत में एक यात्रा ही है। क्या हम यात्री हैं? क्या हम यात्रा आरम्भ करने की दिशा में हैं? ये सार्थक प्रश्न रहेंगे।

इस यात्रा को मेरे बच्चों में कुछ उपाय से मैं जल्दी आरम्भ कर सकती हूँ जैसे – निरर्थक की रोक-टोक को कम करके , उनसे अधिक बात-चीत कर के , उनके कोमल समय में आंतरिक लड़ाई के लिए अकेला छोड़ देने की बजाय उनका साथ दे के, उनके प्रश्नों को सम्मान दे के , बालमन को सम्मान दे के, उन्हें कहानियाँ सुनाकर, उनके साथ खेलकर , उन्हें जब तब गले लगाकर , उनमें ये विश्वास भर कर की जीवन की आर्द्रता स्वयं तुम्हारे अंदर से आती है, स्त्रोत तुम स्वयं हो । ये सब सम्भव हो इसके लिए आवश्यक है अनुशासन। परिवर्तन। पहले मुझमें । फिर तुझमें ।

न चल सकने वाली स्थिति में पैर जकड़ गए एक ही आसन में जमे जमे । हाथ उठा तो सुन्नता प्रतीत हुई। नेत्र भारी । मस्तिष्क हल्का । मन में उठ रहे शब्दों को लिख देती हूँ , ये सारी सुनी सुनाई बातें समाप्त हो तो विचारशून्यता तक पहुँचे मन।

शुभरात्रि।

प्रज्ञा, 18 ऑक्टोबर/अक्टूबर 2018

ललिता का आशीर्वाद

#dhvt #lalitapath #navratri2018 #skyblue

देखोे , बगीचे झरना जुगनू जैसे
शब्द नहीं हैं मेरे पास
मैं तुम्हारे साथ मुंबई के सबर्ब्स में रहने लगीं हूँ।
मुम्बई की अट्टालिकाओं में हवा
सुष्क हो चली है
समंदर अब दूर है
बीच बीच में मकान बन गए
लम्बे लम्बे
हवा बांद्रा से चलती टकराती
कहीं अंधेरी में रुक जाती है
इधर कांदिवली की ठंड भी ज़्यादा
पर नेशनल पार्क है तो गर्मी कम है
थोड़ी बहुत जो नमी है
समझो गोरई ने संभाली हुई है
लेकिन कमी और खालीपन
बम्बई से मुंबई में ज्यादा आने लगा है
मेरे घर तक भी आने लगा है
घर वाले बस स्टॉप और ट्रेन में
ज़िन्दगी का इकतीस परसेंट जीने लगे हैं
वहीं दोस्ती कर लेते हैं
वहीं प्यार हो जा रहा है
बाहर की सुलगाई
घर आके फूंक रहे हैं
समझ नहीं आता था होता क्या है
कभी तो ऐसे आता है कि
बस केक के थैले
कभी किसी से बात नहीं करता
अपने कमरे में बंद हो जाता है
अगले दिन निकलने के लिए
सूरज भी आठ मिनट लेगा
ये तो लिफ्ट आयी और फुर्र
लगता है लड़के को सोने के लिए
बस ट्रेन के साथ घर भी बुक करना था।

तो जगता कहाँ होगा ये
या सो ही रहा है।
इसको जगना होगा
हम आशावादी लोग हैं
झूमने और हल्लाबोल कर के
चुप्पी तोड़ने में यकीन रखते हैं
नीरसता को ढोल बजा के भगा देंगे
कोई मंजीरा बजा दो
शीतल गाना गाती है
रीमा ढोल बजाती है
और बहुत सारी औरतें हैं
इन्होंने मानो बीड़ा उठाया है
की बोरियत की चुप्पी को भगा दो
हकचल करो
आज इसके घर अगले हफ्ते उसके घर
नौराते में हर दिन दोपहर
ठीक बारह बजे आना
नमी बुलाएंगे होठों की
गला तर हो जाएगा
और मन भी
फिर देखना
वो हमारे घरों की चुप्पी टूट जाएगी
वही छोटे शहरों वाली सबको सबसे
काम लगा है की
जरूरत लौट आएगी
तुमको घर आने की चिंता नहीं
जल्दी होगी।
हमारी सोसाइटी की आबो हवा
अब नर्म होगी।
बेटा बोरोलीन तो लगाना पड़ेगा
मौसम का सूखापन
मैं तर कहाँ से करूंगी।
मैं इन छोटी छोटी
कोशिशों से तुम्हारे वजूद के
मतलब को लौटा के
दिखा दूँगी।
यही आशीर्वाद होगा माँ का।

17 अक्टूबर 2018

#प्रज्ञा