याद की बात है -1

घर में हम जिन लोगों के साथ रहते हैं या पले बढ़े होते हैं उनकी या उनसे जुड़ी कोइ न कोई एक बात होती है जो उनके व्यक्तित्व के साथ रूढ़ि हो जाती है ।
वो किसी न किसी समय इस महत्त्वपूर्ण बात को हमेशा दोहराते हैं और फिर इससे जुड़ा कुछ भी आप कहीं पढ़ते हैं या देखते हैं तो फिर उन साथ रहे लोगों का ख़्याल आपको आता है।

ये बातें कोई विज़डम वाक्य हो सकती हैं, कोई गाना , कविता , टेलीविज़न प्रोग्राम , खाने की कोई चीज़, कोई स्थान, मौसम, किसी मोमेंट में मूँह में आया स्वाद इत्यादि।
बचपन की याद से रंगमंच के एक एक कैरेक्टर से शुरू करूँ तो गिनती कहां तक जाएगी पता नहीं।

छ साल की मैं – डिंग डाँग डिंग डिंग डाँग डिंग डाँग डिंग डाँग डिंग डाँग डिंग डाँग पे डांस। मुझे अनुराधा पौडवाल बनना है। मुझे लिपस्टिक चाहिए । जमशेदपुर। झोपड़ पट्टी वाला स्कूल। दो एकम दो। टीन बस्ता। दादा जी। दादी माँ।मामून दी। भालू बासा। धोबी घाट। घर के बाहर कुंआ।मेहंदी के पत्तों का झाड़ ।आँगन में चापा कल। भालूबासा।रूमड़ी दीदी।

दादी माँ – कितना लिखें । बहुत कुछ है। मेरा और मुझसे जुड़ी बातों की शुरुआत औऱ अंत हो सकता है। दादी माँ जैसे अनन्त। ठहाके। मांगुर मछली स्टू। बाड़ी । लीची।कटहल।आम।अनार।भुट्टा।पान।पान का डलिया। लैकमे ।पीयर्स साबुन। नर हो न निराश करो मन को। वीर तुम बढ़े चलो। सावन के जन्मल भादो में कहै ये एहन बाढ़ नै देखलौं। {इसका विस्तार करेंगे बाद में}

दादा जी- सोफा, वीसी आर,टी वी, रामायण, स्कूटर , जमशेदपुर वाले एक्सीडेंट की कहानी। पैर की काली चमड़ी। बिजली बिल। सुखसेना के लोग।कार। गैरेज।साल 2000 का पिकनीक। उनकी डायरी एंट्री। रेडियो।hmt की स्टील घड़ी। मुन्नू। दादी माँ के बात के दर्द में पैर दबा देना, तेल लगा देना। प्राचू बोलना। बुलाना लालू, मधुर, प्रकाश।

पापा – किताबें, पटना, राँची, बाड़मेर, दरभंगा , अल्मोड़ा,आल इंडिया रेडियो, एकै साधे सब सधै सब साधे सब जाए। फ़िल्म डैडी। रिंकल फ्री रैंगलर जीन्स। रोबर्ट लुडलुम।रीडर्स डाइजेस्ट। एकेस्ट्रॉनिकस फ़ॉर यू। कंप्यूटर।पहला नोकिया मोबाइल।

अरुण अंकल – जीवन क्या है निर्झर है मस्ती ही इसका पानी है। मैथ्स बनाई। हनुमान चालीसा। साइकिल। क्लास टेंथ। मोटर साइकिल। मुझे तोड़ लेना बनमाली देना तुम उस पथ पर फेंक।

मम्मी – आजा सनम मधुर चाँदनी में हम तुम मिले। जा जा रे सुगना जा रे कही दे सजनवा से लागे नही जिया मोरा चाहे। योगा क्लास। फतुहा।महेंद्रू।बहाई।जी एम भट्ट।वकील साहब।क्रांति।पटना सिटी।सौदागर।पिंक लिपस्टिक। एक तह बनारसी।व्हाइट अनारकली। कृष्ण मेमोरियल हॉल पटना। इवेंट होस्टिंग।

इलू – धाविका। अभिज्ञान का जन्म। मेरी देखभाल। सहन शक्ति। बने रहो पगला काम करेगा अगला।

बाकी बाद में अभी बहुत दिल हैं बयां करने के लिये सब ऐसे जिगरी की ज़िंदगी कम पड़ेगी निभाने भर के लिए जीना तो बाद की बात है। जान मिले तो ऐसी की जो मिला जान से प्यारा मिला कोई बिन छाप छोड़े गया ही नहीं या फिर मैं वोही देखती रही जो मुझे देखना रहा, बाकी तुम्हारी आदतों से मुझे फर्क ही क्या पड़ता था।

प्रज्ञा मिश्र

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