डायरी 6 अक्टूबर

किसी कला विधान या वस्तु की चाहत में खुद को रगड़ते हुए मैं धीरे धीरे छूटने लगता है। चेहरे की हँसी सौम्य हो जाती है। लगने लगता है कि ये सारा समय कुढ़ कुढ़ करने वाली ये बूढ़ी अम्मा भी किसी कमी से ग्रस्त हैं और उसको पूरा करने के लिए ही नाम ले लेकर माँस खुरच रही हैं।
सामने की बेड पे बैठी नानी जी राउंड राउंड फोन घुमा के दरोगा को अपने बेटे के खिलाफ रपट इसलिए लिखा रही है कि उसको यकीन है जिनके लिए वो सबकुछ छोड़ कर आयी थी वो उससे डर कर उसे अपना लेंगे।

खाली कटोरे में कौर उठाने की मुद्रा में निस्तेज बैठी पैंतालीस वर्षीय महिला अंधेरे में जब कहीं नही देख रही थी तब उसकी आशा की भूख को एक भोले लड़के ने खाना दे दिया। वो क्यों उस दशा तक आयी। उसके साथ ऐसा क्या हुआ। क्यों वो घर घर काम कर पेट नहीं भर रही सोचने से पहले सामने बारिश का मौसम आ गया।
भुट्टे वाला खड़ा है, गर्म आँच कोयले की लाल तपती हुई किसी भी राह चलने वाले को मोह रही थी।

लेकिन सामने पड़े तीस वर्षीय लड़के को वो नहीं मोहती क्योंकि वो बेसुध है , कुचैले कम्बल में पड़ा सा। चार महीने में एक दिन उसे चलते देखा था एक आदमी उसे हर दिन कुछ खाने के लिए देता है। कई दे देते हैं। लेकिन उसके घर वाले कई नहीं रहे होंगे । क्या इनको भगवान देखता है। क्या भगवान ऐसे ही देखता है या ये कोई सबसे सस्ते रेट का प्लान है ।

क्या खोजना है अब ये तो जो चीज़ गम हई है वोही तय कर ले की उसे मिलना है और मुझे ही मिलना है। तब तक हर तरफ देखते देखते ये तय तो करूँ की एक बार मिल गयी तो आगे की एक्शन प्लानिंग क्या होगी।

#हमकिसगलीजारहेहैं

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