स्व का बोध

स्व का बोध, कैसे होगा?

आज बहुत दिन के बाद सोशल मीडिया में कुछ देखने का मन नहीं है। पिछले नौ दिन का व्रत पाठ हवन इतनी तैयारी, गरबा, तस्वीरें तस्वीरों की परतें उनपर बनी कहानियों से मन निकल कर सन्तुलन ढूंढ रहा है।

कल कोई इंतज़ाम नहीं करना। एक साधारण शनिवार होगा। यूँही बैठ कर सहज समाधि का प्रयास करना एक अच्छा विचार लगा। तब तक जब तक पैर सुन्न होकर चलने लायक न रहें और दिमाग की खोह अनंत में एक गली जाती रहे ,अंत का प्रकाश खो जा रहा है, अभिज्ञान अपने मोज़े ढूंढता है, ऐसा मोज़ा ढूँढ रहा है जिसमें छोटी छेद है क्यों?

टाइपराइटर के बढ़ते सीरे को खींच कर फिर निरुत्तर छोड़ दिया, ये पश्न आवश्यक नहीं है।

अभी शून्य आवश्यक है, कम से कम उसके जैसे हो जाने की अवस्था तो होनी चाहिए।

कुछ नहीं सोचने के प्रयास में अचानक स्व के बोध का विचार आया।इसको शून्य कैसे कर दूँ?

स्व का बोध अपनी भाषा में होगा?

नहीं स्व का बोध उस भाषा में बात करने से होगा जो विचार में पहले फूटती है।

तो क्या वो कोई भी भाषा होगी?

हाँ।वो सोचने की भाषा होनी चाहिए।हमारे व्यक्तित्व का पूर्ण विकास होने से ही स्व का बोध हो सकता है।

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास कैसे होता है?

व्यक्तित्व का पूर्ण विकास तब होता है जब हमारी सोच की भाषा पर बोली और लेखन दोनों में मज़बूत पकड़ हो और उसे बोलने उसमें अभिव्यक्त करने में हमारी झिझक शर्म जैसी भावनाएं निर्थक हो गयीं हों।

तो क्या भाषा पे पकड़ स्व का बोध कराएगी?

भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम होती है । वो स्व का बोध कराने में सहायक मात्र होती। अच्छी अभिव्यक्ति के कारण मन कुंठाओं से मुक्त हो सकता है ।मस्तिष्क स्वतंत्र रहता है। मन, तरह-तरह की दैनिक घटनाओं को लेकर ऐसा बोल देती, वैसा बोल देती, यही अच्छा होता, काश वो बोल देती करते हुए अपनी भूतकाल की मानसिक अवस्था का दास नहीं बना रहता।स्वतंत्र मस्तिष्क शान्त होते हैं, चेहरे पर सौम्यता आती है और आत्मविश्वास बढ़ता है।आत्मविश्वास बढ़ने से किसी से कुछ छुपाकर करने की आवश्यकता जाती रहती है, अचानक कोई आ जाये हम कुछ करते रहें उसमें धक्क नहीं उठती की क्या सोचेंगे क्या बताएंगे वगैरह क्योंकि एक तरह से समक्ष परोक्ष एक जैसे हो जाता है हम स्वयं अपने आप से पश्न करने लगते हैं कि क्या तुम्हें ये करना उचित है -तो

हाँ में डर नहीं और ना में कर नहीं।

मेरे पापा के जीवन भर के कई संचित सिद्धांतों में से एक है यह।

तो क्या स्वंतन्त्र मन और आत्मविश्वास ही मूल हैं?

हाँ, ये मुग्ध प्रसन्नचित मन के स्त्रोत हैं । ऐसे व्यक्तित्व के लोग निखरने लगते हैं। एक तरह की आभा उन स्त्री पुरुषों के मुखमण्डल पर आने लगती है जबकी स्व का बोध तो हुआ भी नहीं है। अभी तो वे बस यात्रा में हैं।
ये कांति उनके शरीर की कोशिकाओं से आती है जो की स्वास्थ्य से बढ़ रही है , जिसका मूल था आत्मविश्वास के साथ स्वयं को अभिव्यक्त कर पाने को क्षमता।

तो अब तुम्हें तय करना है कि तुम्हारी अभिव्यक्ति का माध्यम क्या है।

स्व के बोध में और भी कई बातें शामिल हैं , जैसे पश्न करना, निरन्तर पश्नों के हल ढूंढते रहना , कोई काम इसलिए नहीं करना क्योंकि उसे तुमसे कहा गया है। उसकी तह तक जाना कि मैं ये क्यों कर रही हूँ इसका लाभ किसको , इससे क्या क्या बातें आगे काम में आती हैं वगैरह, तो मतलब स्व के बोध के लिए सन्त बनना आवश्यक नहीं है पश्न करना आवश्यक है, सौम्य सार्थक पश्न।

मनुष्य जन्म के साथ नाड़ यूँ तो काट हटा देते हैं डॉक्टर पर असल में वो बेहद उलझी हुई हमारे शरीर के चारों तरफ चिपक जाती है समाज में फिट होने का डर बनकर औऱ मौलिकता जिसके बीच बीच के गाँठों में बेहद सुरक्षित रखी होती है जो कभी तो मिलती नहीं लेकिन ढूँढते रहने से कुछ गाँठे ही खोल पाते हैं।

देखा यही गया है कि एक सिरा पकड़ कर जो अपने आप को खींचता गया खुद को समेटता गया है उसको मौलिकता की सूत मिली । जैसे कोई संगीत को लेकर, कोई लेखन को लेकर , कोई अपनी किसी कला पद्धति के कारण । ख्याति प्राप्त सिद्ध व्यतित्व ने हमेशा मेहनत की ,जिस किसी भी क्षेत्र में हो जैसे – गणित , विज्ञान, कला इत्यादि। एकै साधे सब सधे सब साधे सब जाए। ऐसे लोगों की मेहनत की विधा निर्णय लेने की क्षमता से निर्धारित होती है। जिसकी पुष्टि आत्मविस्वास करता है और आत्मविश्वास एक बार फिर अच्छी अभिव्यक्ति से बढ़ता है। इसलिए एक भाषा का अच्छा और पूरा ज्ञान स्व बोध की यात्रा के लिए बेहद आवश्यक है।

इन सब बातों से ये ज्ञात हो रहा है कि स्व का बोध होना असलियत में एक यात्रा ही है। क्या हम यात्री हैं? क्या हम यात्रा आरम्भ करने की दिशा में हैं? ये सार्थक प्रश्न रहेंगे।

इस यात्रा को मेरे बच्चों में कुछ उपाय से मैं जल्दी आरम्भ कर सकती हूँ जैसे – निरर्थक की रोक-टोक को कम करके , उनसे अधिक बात-चीत कर के , उनके कोमल समय में आंतरिक लड़ाई के लिए अकेला छोड़ देने की बजाय उनका साथ दे के, उनके प्रश्नों को सम्मान दे के , बालमन को सम्मान दे के, उन्हें कहानियाँ सुनाकर, उनके साथ खेलकर , उन्हें जब तब गले लगाकर , उनमें ये विश्वास भर कर की जीवन की आर्द्रता स्वयं तुम्हारे अंदर से आती है, स्त्रोत तुम स्वयं हो । ये सब सम्भव हो इसके लिए आवश्यक है अनुशासन। परिवर्तन। पहले मुझमें । फिर तुझमें ।

न चल सकने वाली स्थिति में पैर जकड़ गए एक ही आसन में जमे जमे । हाथ उठा तो सुन्नता प्रतीत हुई। नेत्र भारी । मस्तिष्क हल्का । मन में उठ रहे शब्दों को लिख देती हूँ , ये सारी सुनी सुनाई बातें समाप्त हो तो विचारशून्यता तक पहुँचे मन।

शुभरात्रि।

प्रज्ञा, 18 ऑक्टोबर/अक्टूबर 2018

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