हर साल दीवाली की सफाई में यादों की परत से धूल हटायी जाती है। उन सारे बेहतरीन दोस्तों को याद किया जाता है जिनके साथ शामें बेफिक्र थी। वो आज भी बिना मतलब याद करते हैं, बताने की फुरसत तो मेरे पास भी कम है।डायरी को तीन बजे वाली धूप में रख दिया है।

नहीं, किसी को उठा के फोन नहीं घुमाना। मैं सारा दिन फोन पर होती हूँ। बात करने के अलावा ऊर्जा क्षीण करने के और भी साधन हो गए हैं।

कितना सामान जिसकी कोई आवश्यकता नहीं समय के साथ जुटता गया जैसे खुद के शरीर की वसा। ये चिपक गए हैं । ये कितने गैर ज़रूरी सामानों का जखीरा अलमारी , उपर के ताखे, बिस्तर के नीचे , साथ दराजों में पड़ा है। सब के बीच अपने आप को रेलेवेंट बताने की एक होड़ लगी है । कोई रिटायर नहीं होना चाहता। बहुत बारीक बहस हो रही है कितना रखा जाए क्या फेका जाए। सोचती हूँ क्या ये दिन देखने के लिए जुटते हैं सामान। सामान के साथ वो दिन क्यों नहीं अटैच हो जाता जिस दिन वो लिया या दिया गया था।

लोग छूट रहे हैं ,याद की ताबीज़ देकर और सामान हैं कि केहुनी जमाये मुँह फुलाये पसरे पड़े हैं।

मेरा छोटा बेटा जब से आया है उसने फेंगशुई की एक मुहीम चलाई है। वो हमारी ज़रूरत के आडम्बरों को तोड़ देता है , हमें समझ आता है कि इसके बिना काम चल सकता था । घर हल्का हो रहा है। जिन बातों को हम याद भी नहीं करते उन्हें तह लगाए पता नहीं क्यों रखा जाता है। कुछ मैं फेक नहीं पाती , कुछ फेंकना मना हो गया , कुछ मध्यम वर्गीय आदत है। सामान काम आएंगे। कभी काम नहीं आये तो बेटी की शादी के सांठ में बांध कर गिफ्ट दिए जाएंगे । लेकिन अब ये सब नहीं चलता तो ऑफिस और एन.जी.ओ. आ गए हैं ।

बहुत सारा सामान निकल रहा है। सब मेरे घर से नहीं निकल रहा और भी लोग बिना मतलब का जुटाते हैं।मैं अकेली नहीं, सभी मेरे जैसे हैं, हम सब एक जैसे हैं।

सरोजिनी नगर से ली गयी ये डायरी “बुलंदियां” कविता से शुरू हुई थी 2004 में | उसके बाद इसमें बहुत सारी प्यारी बातें लिखी गईं । दिसम्बर 2009 के बाद इस डायरी को बंद कर दिया गया ।अब भी बहुत खूबसूरत पन्ने खाली हैं।
कंगन दादी माँ लेकर आयीं थीं मैसूर से। आर्टिफिशयल कॉस्ट्यूम कंगन। मैं दस या ग्यारह साल की थी उन्होंने कहा था तुम्हारे लिए लायी हूँ। उनके जाने के बाद बहुत दिनों से रखे हैं ये कंगन। इसमें एक नट है जिसकी वजह से ये कंगन हर उम्र के हाथों में फिट हो जाते हैं।

जब तक मैं हूँ तुम हो सब रहेगा । बस ऐसा न हो की इन चीजों की वजह से ही हम रह जाएं और एक दिन हमारे होने की जगह न बचे ।

प्रज्ञा 28 अक्टूबर 2018 17:17