Muk Jande Ne Jism Ta,
Par Aatma Amar Hai,
Jide Ang Sang Prabhu Hai,
Onu Phir Kisda Daar Hai

ये कीर्तन के बोल हैं , इसके आगे बड़े शांति पूर्वक ,
“सत नाम श्री वाहेगुरु ” गाया जाता है।

जगजीत सिंह जी की आवाज़ में पहली बार सुना था और अब तक उनकी आवाज़ में ही सुनती आ रही हूँ ।

साल 2005-6 में इनऑर्गेनिक केमिस्ट्री के अध्यापक माननीय हरप्रीत सर का रिंगटोन था ये। कैटनेशन केमिकल सोसायटी की स्थापना से रिलेटेड किसी बात पर सर को कॉल किये थे , तब पहली बार सुने।

उसके बाद बस गुनगुनाये। कभी सुने नहीं। दिमाग में फिट रहा । फिर एक आध बार कोई काम से सर से बात होती तब बतौर रिंगटोन ही सुनना होता था। 2010 के बाद एक बार सर को प्रणाम कहने कभी फिर कॉल किये तो भी यही रिंगटोन सुने। शायद अभी भी यही होगा।

2012 से सोनी का स्मार्टफोन हाथ में रहने लगा और इंटरनेट पर कुछ भी ढूंढने की आदत सी होने लगी तब एक दिन अचानक रिंगटोन के शब्दों का ख्याल आया। चूंकि धुन और शब्द दोनों मुझे बेहद पसन्द थे तो भूली नहीं थी , टूटे बोल गूगल किए…

“मूक जांदे ने …. परमात्मा अमर है… + जगजीत सिंह”

और वही रिंगटोन वाला गाना आया।

फिर जा कर सहीे पकड़े की “मुक जांदे ने जिस्म ता, पर आत्मा अमर है “।

संगीत में बड़ी ताकत होती है , शब्दों का भावार्थ 2005-6 में समझ आचुका था केवल शब्दार्थों को 2012 तक की तकनीकी सुविधा का इंतज़ार रहा।

ये भी है कि किसी मित्र से रिंगटोन का गाना उसके शब्द वगैरह पूछे जा सकते थे। पर मैंने केमिस्ट्री के नोट्स बनाये , पढ़ाई की , नौकरी देखी और खोज की प्रवृत्ति साबुन से धोना सही समझा। लेकिन खोज चिपक जाती है। खोज जारी है।

सतनाम श्री वाहेगुरु बोलने और सुनने से ऐसे भी शांति मिलती है । ये मुझे रोपड़ चंडीगढ़ की यात्रा में कॉलेज ट्रिप के दौरान समझ आया था।

यही असर ओम नमः शिवाय के जाप से भी होता है।

कॉलेज ट्रिप में लौटती संध्या पर “सतनाम श्री वाहेगुरु” को पूरा समूह एक साथ गा रहा था , बस चल रही थी, एक लय था, धीरेधीरे लोग अपने हिसाब से ताल दे रहे थे। तब जिस ऊर्जा का संचार हुआ था उसकी अनुभूति मुझे और कहीं नहीं हुई ।

ये गीत उसी क्षण का स्मरण है।

अशांत मन की दवाई है।

नानी के साथ पटना सिटी का गुरूद्ववारा। दिल्ली में खालसा कॉलेज , बंगला साहिब । मुम्बई में शेरे पंजाब का गुरुद्वारा। यहाँ जा के थोड़ी देर बैठ जाना चाहिए। बैठे रहना चाहिए। मैं बहुत दिन से नहीं गयी। एक रिवाज में हूँ। इसलिए नहीं गयी। अब जाने का रिवाज़ नहीं है। अब शायद एक टूरिस्ट की तरह जाना हो सीधा अमृतसर तस्वीरों के साथ कि हम भी देख आये गोल्डन टेम्पल।

प्रज्ञा
2 नवम्बर 2018
मुम्बई