तस्वीर

तस्वीर

कैमरा अगर मुताबिक तस्वीर लेना भूल जाये
तो स्क्रीनशॉट करिये
एडिट करिये फिट करिये
डिस्कार्ड मत करिए
क्योंकि लम्हा ज़रूरी था।

बन्द एलबम को खोलना
उन्हें धूप दिखाना
स्केल में पाउडर डाल
नमी खंगालना
सब बिना मतलब के काम नहीं हैं
याद संजोना ज़रूरी है।

लोग हँसते है ,अरे!
क्या तस्वीर निकालते रहती हो
कहाँ करोगी डेवलप अब
लैपटॉप में बंद कर रखती हो।

पर देखती भी तो हूँ
अचानक सालों बाद
“हे !सी व्हाट डिड आई फाइंड!”
की तसल्ली कर।
कैसे होगा ये सब
अगर दुबक जाऊंगी
कैमरे से शर्मा कर।

यादों की जुगाड़ उनको
भूल कर फिर फिर
याद करने के लिए होती है।

बच्चा बिना जल्दबाज़ी के
ज़िन्दगी की चॉक्लेट
पॉकेट में रखना चाहता है।
मोमेंट दर मोमेंट
थोड़ी सी ऑक्सीटोसिन
बढ़ाये रखना चाहता है।

निकालो सब बाहर अभी,
अलमारी में जितने बन्द राज़ हैं।
सबकी तस्वीर करते हैं
और परवाह करनी किसे
लोग बाद में कुछ कहते हैं
बाद क्या होता है?
उसके बाद क्या होता है?
जिसे लिया ही नहीं
जिसे जिया ही नहीं
वो फ्रेम ही कहाँ होता है?

नहीं रहेंगे उदास बेहाल बिखरे
हमें तैयार होना है
अभी होना है
एक तस्वीर लेनी है
ऐसे नहीं तो वैसे
लहराना है रंग होकर
बगैर हो या फिल्टर।

प्रज्ञा मिश्र
3 नवम्बर 2018

तस्वीर – दीपिका कोलस्कर से साभार