सप्ताहांत की डायरी

ये एक और वीकेंड चला गया । मुंबई की व्यस्त जीवन शैली के लोगों को बेहद व्यस्त सप्ताहांत जीने की आदत हो चली है। वो चले जाते हैं कहीं। कभी अपने घर में । कभी घर से दूर। घर वहीं रहता है । कभी कभी घर हमसे अपनी मरम्मत के लिए अपॉइंटमेंट लेता है तो कभी हम वक़्त से अपनी मरम्मत के लिये। ये सब अभिज्ञान के साईकल के पहिये की तरह चलता रहेगा। उसकी साइकिल हरी है। कल उसकी मरम्मत हुई।सीट ऊंची हो गयी , पहिये थोड़े समझदार दिखने लगे हैं।

हम आदमी से ग्रह हो चले हैं एक दूसरे से बराबर दूरी बनाए हुए अपनी धुरी पर घूमे जा रहे, हमारे दिन होते हैं , रातें होती हैं । लेकिन कोई हमारे चोबीस घन्टों का हिसाब नहीं रखता । हर आदमी का एक मेट डिपार्टमेंट होना चाहिए जो बताये कब खुशियों की बारिश होने वाली है। कब दुख के बादल मंडराने वाले हैं। कब ये बिना मौसम कड़कने लगेंगी। इन महाशय पर हालातों का कितना दबाव है, मानसिक लो प्रेशर बेल्ट में कितनी गति से उधेड़बुन प्रेवश करने वाले हैं , इत्यादि। अगर हम धरती हो चले हैं तो हमपे रहता कौन है, क्या यादें बसती हैं हम पर ? यादों की देह खाती क्या होगी, रहती कहाँ होगी, सोती कैसे होगी और कभी बूढ़ी होती होगी?उनकी खुराक के लिए मन के कौन से बह्मांड से सूरज फूटता होगा , आखिर कुछ तो होगा उनकी ऊर्जा का स्रोत की वो चली आ रही हैं यथावत सदियों से आनुवंशिकी में संक्रमित होती हुई आदत बन कर।

कुछ तो है जो छूटी कुचली रह गई बातों की जड़ को भीतर खींचता है जैसे पीठ पर लाद कर खुद को चुम्बक बना लेना है और चिपक जाना है विडम्बनाओं की तरह । ये बड़ा सा चुंबक और भी कई बातें खुद में खींचे जाता है इसे लालच है बने रहने का , बड़ा बनने का।

कई सारी आवाज़ों के बीच एक आवाज़ जिसका कोई ज़िक्र नहीं होता अंशुमन को सुनाई देती है।धीरे से चाभी घूम कर सेफ्टी डोर खुलने की आवाज़। पापा के आने की सुगबुगाहट । मुझे कभी नहीं सुनाई नहीं दी आज तक, किसी और को नहीं पता उस आवाज़ को सुनने का सुख और आँखों में चमक भर कर दौड़ जाने का सुख कैसा होगा। हम समय मे पीछे लौट नहीं सकते किसी और से उसका अनुभव ले भी नहीं सकते। लेकिन खुशी हवा में एक बार घुसी तो कन्धा कन्धा छूते निकलती है, लँगोटिया यार की तरह । सब बाहर आ जाते हैं। किसी के आने पर एक जगह इकट्ठे होने जैसे। फिर नए सिरे से और कुछ शुरू करने के लिए ।
ऐसे क्षणों में बहुत ताकत होती है, कीलें चुम्बकों से भड़ भड़ा कर गिरने लगती हैं और धरती चपटी होकर रोटियों की उड़न तश्तरी बन जाती है, सारा घर उसी पर उड़ता है।

#प्रज्ञा

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