बढ़ती बदलती चन्द्र कलाएँ

अमर रहें चन्द्रप्रभा
जीता रहे चन्द्रालय
कुछ हिस्से बम्बई पूना से
कुछ दिल्ली वाले होकर
कुछ बिहार में सोते उठते
कुछ एम पी वाले बनकर
देश बिदेश में नाम कमाने
नामे रौशन करकर
जहाँ गए हम रूप
तुम्हारा साथ गया है
परिवार का आकार लेकर
ये जाता जाएगा
नए नए काम करने अलग अलग
नामों से चाँद प्रभा बनकर।

देशहित का आह्वान

देशहित का आह्वान

जय हिंद के बहुत सारे रंग हैं,
पर सफेद भारी पड़ता है।
क्योंकि सरहद पर रंग वीरता का
आपकी हमारी शांति को
बचाये रखने के लिए
डट कर लड़ता है ,
कभी आतंकवाद से ,
कभी मौसम की मार से।

हमारी मुस्कराहट की हरियाली बरकरार रहे
इसलिए बिछ जाते हैं मुस्तैद हरी वर्दी वाले वीर सैनिक धरती का कवच बन कर तन कर होकर ,
आराध्य दीपक, सांझ पड़ने वाली बाती सा।

लौ बुझने न पाए
आम आदमी भी
देशभक्ति में आगे आये
देशभक्ति, भ्र्ष्टाचार को विकल करती है
देशभक्ति देश हित में प्रश्न करती है
खोखले वाचन से कर्ता का मौन-कर्म अच्छा
आह्वान करो और आश्वासन दो
अपने स्तर पर भी हम सभी करते रहें
देश हित में अच्छा।

– जय हिंद
– जय जवान
– जय किसान

सुबह सवेरे संवाद

सुबह सुबह ऊँघती आँखों से निकल कर टिफ़िन बनाने और स्टील के बर्तनों की टिन टुन से ज्यादा क्या ही बोला जा सकता है। टाइम के हिसाब से आपाधापी में सब रूटीनवत होता रहता है। लेकिन दिन भर की बाय और लिफ्ट में घुसने के बीच आज एक बहुत अलग संवाद हुआ।

“प्रियंका गाँधी एक्टिव पॉलिटिक्स में आ गई है ।”

“हाँ, पढ़ा मैंने।”

कौन थी वो

उसके शरीर की सारी कोशिकाएं
तितलियाँ होकर उड़ गयीं
गली के बच्चों में
टॉफियां बाँटते बाँटते।

एक झोला टाँग कर
वो जब भी गुज़रती थी
औरतें बड़ी करुणा से
सर पर पल्लू लिए
एक छोर दाँत दबाए
अपने बच्चों का सिर ठेल देती थीं
उसकी तरफ
वो पुचकारती
और चल देती
अगली गली पकड़कर।

वो उल्टे पैर सड़क पर
अपना रास्ता नापती चलती थी
खोया कुछ छूटा कुछ रह गया कुछ
ढूँढती हुई सी।

दरवाजे पर मुड़ी पीठ और
दोनों बाजूओं की कोशिश से
हर रोज़
खुद को गुम कर दिया उसने
काल कोठरियों के साये में।

घुटनों को पेट तक खींच कर
एक जोड़ी बनारसी साड़ी में
बक्सा बन्द हो गयी वो
फिर नज़र न आने के लिए।

खिड़की से बच्चे ताकते हैं,
कोई पानी फेकता है,
कोई गर्म चाय,
लेकिन आवाज़ नहीं आती
बू आती है।

लोग आते हैं
होती रही ताक झाँक
पूछता कोई नहीं
कौन थी वो
कहाँ गयी वो
बच्चे ढूँढते हैं टॉफी वाली आंटी
पर पूछता कोई नहीं
कौन थी वो।

प्रज्ञा
2 जनवरी 2018

महुरत

न चार दीवारी टूटती है

न घर की चौखट छूटती है

शब्द कब तक बेचैन बंधे रहें

किताब की सेज पर बिछने को

महुरत की देह पर लोहे की सील है

न कैंची से कटती है न हथोड़े से पटती है।

हालात और मजबूरियों के बहाने

खोखले होते हैं,

जिन्हें मालूम अपनी अहमीयत

वो एक दिन चुप हो जाते हैं

बस मुस्कराते हैं

और लिखकर छोड़ देते हैं ज़माना

दुनियादारी तुम्हारे भरोसे

इसका खयाल रखना

कोई तो दस्तूर निभाये

हम तो इसके काम न आये।

#प्रज्ञा

20 जनवरी 2019

सुबह 5 बजकर 13 मिनट

इस वक्त क्या कर रही हो?

त्रिवेणी पढ़ रही हूं।

“फिरि फिरि भूंजेसी तजिऊँ न बारू”

भाड़ की तपती बालू के बीच पड़ा हुआ अनाज का दाना बार बार भूने जाने पर उछल पड़ता है,पर उस बालू के बाहर नहीं जाता।

कैसे कैसे बचपन

कैसे कैसे बचपन

तुम्हारी किताब में बंद गुलाब के सूखे फूल
अलमारी में एक तह लगे खिलौनो के सेट
नहीं रहे मेरे होने में
मिले मुझे कीड़े लगे चने
छाँट कर बढ़ा देने को और
ऊँघती पसीने की बदबू
ट्रेन और बसों में
एक बचपन काटने के लिए
तुम आबाद हुए और मेरी
कलम फली फूली
बहुत दिया ऊपर वाले ने
याद में सँजोने के लिए
किसी का कुछ घाटा नहीं है
कोई खाली हाथ जाता नहीं है
तुम्हारे तोहफे शीशों में बंद
शान बढ़ाते हैं हाकिम हो
कोई ढूँढता ही जाता है
ताखों पर गिरे टूटे
चश्मे बनवाने के लिए।

11 Jan 2019

दस्तक

रास्ते में पड़ा मेरे काम का समान
किसी और को दे दिया जाए
उन कमरों तक बढ़ने दिया जाए
जहाँ दिल रहता है जहाँ मैं रहती हूँ।

कोई रौशनी जुगनू बनकर देर रात
खिड़की के बाहर आती है ।
पर ठंड का बहाना है और सारे पर्दे बन्द।
वो खड़ी रही नहीं जाती है।
डराती है बनकर अजन्मी अकांछाओं का प्रेत।
कौंधती हैं होकर मेरे मस्तिष्क में कागज़ पे निकलती सम्वेदनाएँ बनकर ।