महुरत

न चार दीवारी टूटती है

न घर की चौखट छूटती है

शब्द कब तक बेचैन बंधे रहें

किताब की सेज पर बिछने को

महुरत की देह पर लोहे की सील है

न कैंची से कटती है न हथोड़े से पटती है।

हालात और मजबूरियों के बहाने

खोखले होते हैं,

जिन्हें मालूम अपनी अहमीयत

वो एक दिन चुप हो जाते हैं

बस मुस्कराते हैं

और लिखकर छोड़ देते हैं ज़माना

दुनियादारी तुम्हारे भरोसे

इसका खयाल रखना

कोई तो दस्तूर निभाये

हम तो इसके काम न आये।

#प्रज्ञा

20 जनवरी 2019

सुबह 5 बजकर 13 मिनट

इस वक्त क्या कर रही हो?

त्रिवेणी पढ़ रही हूं।

“फिरि फिरि भूंजेसी तजिऊँ न बारू”

भाड़ की तपती बालू के बीच पड़ा हुआ अनाज का दाना बार बार भूने जाने पर उछल पड़ता है,पर उस बालू के बाहर नहीं जाता।

कैसे कैसे बचपन

कैसे कैसे बचपन

तुम्हारी किताब में बंद गुलाब के सूखे फूल
अलमारी में एक तह लगे खिलौनो के सेट
नहीं रहे मेरे होने में
मिले मुझे कीड़े लगे चने
छाँट कर बढ़ा देने को और
ऊँघती पसीने की बदबू
ट्रेन और बसों में
एक बचपन काटने के लिए
तुम आबाद हुए और मेरी
कलम फली फूली
बहुत दिया ऊपर वाले ने
याद में सँजोने के लिए
किसी का कुछ घाटा नहीं है
कोई खाली हाथ जाता नहीं है
तुम्हारे तोहफे शीशों में बंद
शान बढ़ाते हैं हाकिम हो
कोई ढूँढता ही जाता है
ताखों पर गिरे टूटे
चश्मे बनवाने के लिए।

11 Jan 2019