उसके शरीर की सारी कोशिकाएं
तितलियाँ होकर उड़ गयीं
गली के बच्चों में
टॉफियां बाँटते बाँटते।

एक झोला टाँग कर
वो जब भी गुज़रती थी
औरतें बड़ी करुणा से
सर पर पल्लू लिए
एक छोर दाँत दबाए
अपने बच्चों का सिर ठेल देती थीं
उसकी तरफ
वो पुचकारती
और चल देती
अगली गली पकड़कर।

वो उल्टे पैर सड़क पर
अपना रास्ता नापती चलती थी
खोया कुछ छूटा कुछ रह गया कुछ
ढूँढती हुई सी।

दरवाजे पर मुड़ी पीठ और
दोनों बाजूओं की कोशिश से
हर रोज़
खुद को गुम कर दिया उसने
काल कोठरियों के साये में।

घुटनों को पेट तक खींच कर
एक जोड़ी बनारसी साड़ी में
बक्सा बन्द हो गयी वो
फिर नज़र न आने के लिए।

खिड़की से बच्चे ताकते हैं,
कोई पानी फेकता है,
कोई गर्म चाय,
लेकिन आवाज़ नहीं आती
बू आती है।

लोग आते हैं
होती रही ताक झाँक
पूछता कोई नहीं
कौन थी वो
कहाँ गयी वो
बच्चे ढूँढते हैं टॉफी वाली आंटी
पर पूछता कोई नहीं
कौन थी वो।

प्रज्ञा
2 जनवरी 2018