उचाट के विवादी स्वर

पूरा जीवन जैसे कोई डैशबोर्ड हो,
हरा रहना है , निरन्तर स्फूर्त रहो!
अरे! सुस्त पड़े रहने का मन करे
तो किसी का क्या जाता है!

क्यों 24*7 होश मुस्तैद चाहिए।
रहने दो गर्दन टिकाए,शून्य देखते
कभी वो भी अच्छा लगता है,
पर नहीं, कंधा जकड़ के खीचेंगे!
उठाने के नाम पर,
अच्छा लगे या न लगे।

भेड़ हैं !
बकरी हैं!
भावनाएं चर गए,
मन चट हो गया!
इक्षाएँ डकार गए।
अब हाँके जाते हैं ।
उसी में भविष्य दिखता है।
वर्ना सामान के साथ
हाइवे पर ताकते रहजाएँगे ,
उंगली से गाड़ी रोकते।
और करो हिम्मत ,
कहा था अकेले रह जाओगे।।
अब शाम तक घर नही पहुंचे
तो तेंदुए के हवाले कर दिए जाओगे।
ये जंगल है , कॉन्क्रीट दिखता है,
भेड़िये रहते हैं, लूट लगती है ।
पर ये भूक है जो कहाँ मिट्ती है,
जाओ जाओ, मत आना,
जन्म लेने , अगली बार ,
कैसे भी कितना भी भरा हो घड़ा
जुगत करके खाली करलो इसी पार।

-प्रज्ञा, 24 फरवरी 2018,
9am, मुम्बई

बस – ट्रेन पर लिखने के लिए बहुत सारा मैटर मिलता है, उसमें से एक सहयात्री ने मन की बात कुछ ऐसे निकली :

“यहाँ ज़िंदा कौन रहना चाहता है, बस आसान रास्ते लेना मेरी शान में नहीं है, इसलिए कोशिश जारी है।”

फिल्मिस्तान फ़िल्मी है:)

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