तत्सम में ईश्वर नहीं मिल रहे थोड़ा बनावटी पन मिल रहा है जैसे की ईश्वर पाने की चाह के बजाय प्रशंसा पाने की चाह अधिक होना , वहीं एक दास्तानगो की खुसरो के लिए कही दीवनगी में आँखें बंद होकर इबादत साकार हो रही है। लोग झूम कर तालियाँ बजा रहे हैं मन की डोर में कुछ ढील मिल रही है और वे गा गा के साथ उड़ने लग रहे हैं।

किंचित खोज अपने आप में रूढ़ नहीं होना चाहती इसलिए वो रूढ़ियों से विलुप्त हो रही है। पर क्या करें देश रूढ़ हो रहा है। समाज रूढ़ हो रहा है। खोजी विलुप्त हो रहें हैं।ये हमारे हाथों में नहीं।

गुफ़्तम तरीक़-ए-आशिकां

गुफ्तर वफादारी बुवाद

गुफ़्तम मकुन जौर-ओ-जफ़ा

गुफ्तर के इन ख़ैर-ए-मनास्त

अपने शाह से ख्यालों में बात चीत में ख़ुसरो पूछते हैं

“Guftam tareeq-e-‘ashiqan”
What is the way of lovers?
प्रेमियों का कर्म क्या है?

जवाब आता है:
gufta wafadari buwad”
Loyalty Forever.
स्थित निष्ठ।

फिर ख़ुसरोे गुज़ारिश करते हैं
Guftam makun jaur o jafa
“Then do not be cruel and wicked”
तो फिर क्रूर न बनें।

निज़ाम कहते हैं
“gufta ke iin kar-e-man ast”
That is my job.
यही मेरा काम है.

#प्रज्ञा

यह पेंटिंग साल 2016 में स्वाति रॉय की एक मित्र से ली गयी है, पोस्ट करने की आज्ञा भी बरसों पहले ली जा चुकी थी।

फ़ोटो साभार : स्वाति रॉय की मित्र