हल्की फुल्की पति सहानुभूति 😋😋

“देखो बच्चे ने सूसू कर दिया कभी तुम भी कपड़ा उठाओ और पोछ दिया करो। अरे सुबह का नाश्ता ही तो है , दूध गर्म करो कॉर्न फ्लेक्स के साथ लेलो। आज दही में जामन तुम लगा दो। स्टैंड में बर्तन कभी तुम भी ठीक किया करो। बच्चे को रात में जग के डायपर बदलना तुम्हारी ड्यूटी। तुम डेली कम से कम एक घंटा बेटे को प्लीज़ पढ़ाया करो।

कहीं बाहर जाओ तो बताओ अब बच्चों को खाना भी डैडी के हाथ से है तो क्या कर सकते हैं , आई अंडरस्टैंड।

अच्छा सुनो आज इसके बाल धोने हैं , इसे पापा के ही हाथ से नहाना अच्छा लगता है, मैंने पढ़ा है लड़के पापा के हाथ से बचपन में नहाया करें तो बड़े होकर सिकोलॉजीकॉली फ्री माइंडेड होते हैं।

सब्ज़ी लाना तुम्हारा काम, फ्रूट्स की क्वालिटी तुम्हे ही अच्छी समझ आती और बारगेनिंग भी तुम ही अच्छी करते तो प्लीज देख लेना। दूध वाले का ऐप डाउनलोड कर लो प्लीज मंथ एन्ड में पेमेंट मत भूला करो। ग्रोसरी के ऑफ़र्ज़ में तुम्हारा ब्रेन थोड़ा फ़ास्ट चलता तो देखो क्या डिस्काउंटेड आफर है। कर लोगे न।

हमारी पॉलिसी के बारे में तुम कुछ सोचते भी हो। कोई फाइनैंशल प्लानिंग है। म्युचुअल फंड्स और इस आई पी से लेकर एल आयी सी और एफ डी तो सब तुम ही देखते हो अब डिले करोगे तो कैसे चलेगा ।

घर में कोई फंक्शन है तो सारा सामान लाना , कपड़ा , लेन देन तो सब तुम्हारी खैर ख्वाह में है तो इसमें मेरी रोक टोक क्या लगाऊं घर के बच्चे लड़कों से लेकर बड़ों का टेस्ट तुम्हे पता है ही , शॉपिंग की ज़िम्मेदारी हर बार की तरह तुम ही लेलो।

राशन क्या आएगा। पकवान क्या बनेंगे । दौड़ दौड़ के बच्चे को गोदी में लेकर बराती कौन क्या खा रहे तुम ही देख सकते हो सारे परिवार की आशा तुम ही से है।

मैं तुम्हारी पूजा कर लूँगी । सारा दिन बनारसी साड़ी और गहने में बिज़ी काजू बर्फी खाके रात में थक सो रहूँगी। कितने काम रहते हैं मुझे 😍।

अपेक्षा

मैं मेज़ पर रखी चाय से अपेक्षा रखती हूँ।

घर की साफ सुथरी फर्श पर लेट,
गर्मी की शाम खुशनुमा करती हूँ।
घर में लोग होते हैं, सबसे बात होती है।
अपेक्षाएँ केवल चाय की प्याली समझती है।

कितनी और भी ऐसी
निर्जीव अपनी सी
चीजों की दुनिया है हमारी,
ये बोलते नहीं
कहीं जाते नहीं।
गुम होते रहते हैं बस
इनमें रिंगटोन लगाओ।
मोबाइल से ज़रूरी
एक डायरी
कुछ सालों से गुम है।
मेरी अपेक्षाएँ नम हैं।

*प्रज्ञा*

*हर मौसम की चाँदप्रभा*

प्रभा अपनी अलमारी में
जीवन में देखे परखे
सारे मौसम रखती थी
जितने महीने उतने ढंग
हर बसन्त में पीला रंग
मधुश्रावणी के मेले जैसी
सहज विविधता भरती थी।

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मौसम – अभिज्ञान रचित

मौसम

सुहाना मौसम है
आसमान में चिड़ियाँ उड़ रही है
सड़क पर गाड़ियाँ चल रही हैं
बिल्डिंग्स बड़ी बड़ी
उसमें लोग रहते हैं
यहाँ पर कुछ घर है
यहाँ पर कुछ मॉल हैं
इस सड़क पर काम जारी है।

– मास्टर अभिज्ञान मिश्र
कक्षा 2

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वहाँ दास्ताँ मिली

“माय ग्रन्डपेरेंट्स” लिखकर जिस इतिहास की एक झलक अरुण अंकल ने आज फेसबुक पर साझा की है , मैंने उस इतिहास को देखा था। उनके पैर छुए थे। बैठ कर हौले हौले पैर दबाते हुए उनसे आज़ादी के समय की कहानियाँ सुनी थी। इनको चुपचाप माला जपते मुस्कराते और गर्दन हिला कर आशीर्वाद देते देखा था। ये दो लोग मेरी दादी माँ के जनक जननी है । इन्हें मैं बड़े दादा , बड़ी दादी कहती थी।

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