जहाँ छोर खत्म होती हो
पुल के उस मुहाने पर
एक बसेरा बनाएंगे
छोटी सी नाव में बैठे
लहरों से करेंगे बातें
हम इस बार छुट्टियों में
भीड़ से बहुत दूर जाएंगे।

वहाँ पसरा हुआ आसमान
कितना मुझसा लगता है
जैसे बरसों की थकान
मिलकर समन्दर में घोलता है
हम इन हवाई बरामदों में
बेसुध सो जायेंगे
इस बार छुट्टियों में
बहुत दूर जाएंगे।

गूँज समूह में रविवार के दिन एक एक चित्र पर क्षणिका लिखने दी जाती है ।आज का चित्र पिछले रविवार की विजेता कविता माथुर जी ने दिया । यह तस्वीर उन्होंने मालदीव्स यात्रा के दौरान ली।

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#प्रज्ञा