रोज़ दोनों शावक गोशाला से अंगरियाल गुफा तक दौड़ लगाते। गुफा के अंदर वो क्या करते मालूम नहीं। कई बार तो पूरे दिन वो गुफा में रहे आते। हमने यह बात जब गाँव के लोगों को बताई तो उन्होंने गुफा का मुआयना किया। पता चला कि वहाँ ज़मीन पर बाघिन का कंकाल पड़ा है और छत पर हमेशा की तरह ततैयों के छत्ते टँगे हैं। चमगादड़ लटके हैं। अब हमारी समझ में आया कि दोनों शावक गुफा में क्यों जाते थे।

कहानी – बाघों वाला गाँव
लेखक – मुकेश नौटियाल
#साइकिल #इकतारा फरवरी-मार्च 2019

साइकिल में छपी इस कहानी में बाघिन के बच्चे , जब तक जंगल वापस न भेज दिए गए तब तक वे क्यों जाते हैं गुफा में?….. बेहद मार्मिक कहानी।

इसे पढ़कर मैं आदम-

दिमाग के बारे में सोच रही हूँ।

चार पैर के जानवरों के आपस का प्रेम ही अब शुद्ध प्रेम रह गया है। आदमी का प्रेम बदला-पैंचा की कैटेगरी में है।
साथ अच्छे दिखते हैं कि नहीं, कितने ऊंचे हैं,कितने लंबे हैं, कितने गोरे , कितने काले, कितने पैसे वाले ,कौन जात, कौन धरम, किराए का घर की अपना घर, कितने ओहदे वाले। बीमारी में इलाज कराने के लिए पैसा नहीं है इसको मरने छोड़ना पड़ेगा और दुखी हो रहे हैं ऐसा भी दिखाना पड़ेगा। इससे मुझे कोई फायदा है कि नहीं, लाइबिलिटी है की ऐसेट है, इसके जान पहचान में मेरे किसी काम लायक कोई बिग शॉट है कि नहीं। इस सम्बंध में मेरा आर्थिक लाभ कितना है, सामाजिक लाभ कितना है। यही रह गया आदमी । हर अनुचित निर्णय को “सरवाइवल ऑफ द फिटेस्ट का इम्पलेमेंटशन” मान कर रिश्तों को ताक पर रख कर आगे बढ़ गया आदमी ।