आज मैंने श्रीकांत वर्मा द्वारा लिया गया ऑक्टविया पॉज़(1980 में भारत में मेक्सिको के राजदूत) का साक्षात्कार पढ़ा। पढ़ने के बाद मेरी यह सोच और भी पक्की हो गयी है कि हमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को लिखने बोलने में स्वयं को प्रतिदिन प्रबल करना है। हम भारतीयों की बौद्धिक मध्यम वर्गीयता तब तक बनी रहेगी जब तक हम केवल अंग्रेज़ी को घर आये मेहमान की इज़्ज़त बख्शते रहेंगे।

हमारी मौलिकता हमारा दर्शन है , केवल राजनीतिक सूपर पॉवर बनना भारत का ध्येय न था न हो सकेगा क्योंकि उससे सभ्यता का पतन होता है। हम वो हैं जिन्होंने सभ्यताओं के पालने बनाये उन्हें ममत्व दिया और सींचा है।
हमारे बच्चे , देश के छात्र क्या पढ़ रहे हैं, क्या देख रहे हैं क्या इतिहास बताया जा रहा है ,ये तथ्य केवल भारत के सन्दर्भ में संवेदनशील नहीं बल्कि आने वाले समय में विश्व स्तर पर भारत किस तरह दिशाहीन समाज का मार्गदर्शक बनकर उभरता है इसके लिए भी ज़रूरी है।
वाकई भारतीय कलाकारों , साहित्यकारों और कवियों पर एक बड़ी जिम्मेदारी है- सभ्यता की आर्द्रता को सुरक्षित रखने की ज़िम्मेदारी। मैंने कला और सहित्य पर ज़ोर दिया क्योंकि अभी का समाज विज्ञान को कला के साथ देख पाने में समर्थ नहीं ।

दुर्भाग्य ही है एक बहुत बड़ी जनसंख्या अपने अपने कार्यालयों में यूरोप और अमरीका के निर्देश पर जीविकोपार्जन पाते असहाय गुमनाम भारतवासी भर हैं। हमारी छटपटाहट जायज़ है डिसिप्लीन्ड फन और जॉब सेक्युरिटी के नाम पर हम कब तक अपने पहनावे , भोजन की पद्धति , संस्कृति को “ट्रेडिशनल डे” की पुड़िया में जीते रहेंगे । ये नौकरियाँ अब हमसे हमारे बड़ों को अपमानित कराने का काम करा रही हैं, जो जितना उमर दराज़ उसे उतना कमतर होने का एहसास करा रही है। ये बहुत भयावह है क्योंकि ये चलन समाज मे बुजुर्गों की स्थिति को कमज़ोर करेगा, हमारे घरों तक घुस जाएगा ये चलन। ये पूरा ह्रास है। हम वो मेंढक होते जा रहे हैं जो पहले थोड़ा थोड़ा एडजस्ट होने के नाम पर सहता है फिर पानी के तापमान के अचानक बढ़ जाने से उसमें छटपटा के मर जाता है क्योंकि वो एडजस्ट करने के चक्कर मे छलाँग मारने की क्षमता भूल चुका होता है।

इस परिवेश में यदि अपनी मौलिकता की तरफ मुड़कर अपने आपको सबल करना है तो वाकई भारतीय अत्तीतोन्मुख संस्कृति का हाथ थामना उचित है। उदाहरण के तौर पर हम ऐसे साहसी लोगों को भारत में देख रहे हैं जो बसी बसाई नौकरी के मझोलेपन को तोड़कर कृषिओन्मुख जीविकोपार्जन की तरफ बढ़ रहे हैं, वैदिक जीवन शैली अपना रहे हैं। अपनी मौलिकता के सहारे ऊपर चढ़ने से ही हमें अपना आत्मविश्वास वापस मिलेगा जो अमूमन हर मध्यम वर्गीय “मे आई गो टू टॉयलेट सर” पूछते-पूछते कक्षा एक से दस तक में गंवा चुका होता है।

Pragya Mishra