वहाँ दास्ताँ मिली

“माय ग्रन्डपेरेंट्स” लिखकर जिस इतिहास की एक झलक अरुण अंकल ने आज फेसबुक पर साझा की है , मैंने उस इतिहास को देखा था। उनके पैर छुए थे। बैठ कर हौले हौले पैर दबाते हुए उनसे आज़ादी के समय की कहानियाँ सुनी थी। इनको चुपचाप माला जपते मुस्कराते और गर्दन हिला कर आशीर्वाद देते देखा था। ये दो लोग मेरी दादी माँ के जनक जननी है । इन्हें मैं बड़े दादा , बड़ी दादी कहती थी।

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