प्रभा अपनी अलमारी में
जीवन में देखे परखे
सारे मौसम रखती थी
जितने महीने उतने ढंग
हर बसन्त में पीला रंग
मधुश्रावणी के मेले जैसी
सहज विविधता भरती थी।

गर्मी की शामों में
सुपरनेट की रंगीन साड़ियाँ
मधुबनी बाज़ार वाले
बजरंग बली मंदिर में
मंगल के मंगल
तह तैयारी से रीझती थी।

शादियों के सीज़न में
सारे परिवार की धरोहर सरीखी
सहेजी समेटी ज़ेवर सी सिल्क
निकला करती थी।

बरसात पता नहीं कैसी होती होगी
काश मैं साथ बारिशों में भी रही होती
जो हम चेरापूंजी के वाशिंदे होते
मानसून की छुट्टी में भी
तुम्हारे कायदे देखे होते।

जाड़ों में इकट्ठी
पशमीना की शालें
अँगूरा और मोंटे कार्लो
की स्वेटरें चढ़ा करती थीं।

एक बसन्त बाद
जब मार्च आता
पूर्णियाँ के बरामदों से
तुम फगुआ की टोली
सी दीखती थी ।

स्टील के जग में
बहिनदाय रंग घोलती
गप्प सड़का बिखेरती थी।

तुम्हारे बाद तुम्हारी अलमारी
बिन मौसम बरसात का
एक म्यूज़ियम है,
जिसे हम सेल्फ़ी पॉइन्ट
नहीं बनाएंगे ।

लोहे के ठंडे शरीर से,
गाल लगा आंखें मूंदे
नार्निया की साहसिक
कहानियों की तरह
तुम्हें फिर खोजने जायेंगे।

रोज़ झरेंगे दोत्तला मकान
के नीचे हर सिंगार
सुबह पाँच बजे
सुखसिंह के मैदानों की
हल्की गीली घास पर
तुम्हारे पैरों के निशान देखने जाएंगे।

20 April 2019

Pragya Mishra