Kuku FM पर शतदल- 29 मई- बेटा अभिज्ञान

हेलो दोस्तों।

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कुकू एफ एम पर शतदल के श्रोताओं को प्रज्ञा का नमस्कार ।आज बुधवार है, आप सुन रहें है “इतनिमान के ख्यालात”।

आज मैं सुनाऊँगी कविता शैली में एक कामकाजी माँ के मनोभाव जो शहरी जीवन मे अपने बच्चे को घर पर छोड़ कर सारा दिन बाहर होती है। दिन की थोड़ी सी गलत शुरुआत कितनी भारी गिरती है उसपर। हम समझते हैं बच्चा छोटा है चीज़ों को भूल जाएगा उसे कहाँ याद रहेगी पाँच साल के उम्र की डांट डपट। लेकिन ऐसा नहीं होता वे चिड़ चिड़े हो जाते हैं। समूह में जाने से कतराते हैं। अचानक से रोने लगते हैं। हाथ उठाते हैं क्योंकि उनको भी समझ नहीं आती की कमी कहाँ है, वे तो बच्चे हैं।
ये समझदारी मुझे मेरे बेटे की परवरिश के साथ आयी। इसलिये बच्चा माँ बाप का शिक्षक भी हो जाता है। लालन पालन जैसी बड़ी शिक्षा बच्चे ही तो हमें सिखाते हैं। बहुत खुशनसीब होते हैं वे बच्चे जिनके माता पिता पहले से बाल मनोविज्ञान समझते हुए अपने बच्चों की परवरिश करते हैं।

एक बार की बात है, परिवार के कुछ लोग छुट्टियों में मिलकर प्रस्थान कर रहे थे। आदतन हमने आपस में तस्वीर ली। पाँच वर्षीय मेरा बेटा किसी बात पर चिढ़ गया और इस हद तक बात चली गई की उसने खुद को सबसे अलग कर लिया। मैंने अलग कमरे में ले जा उसे ऐसे बरताव के लिए दो थप्पड़ जड़ दिए। वो और गुस्सा हो बातें करने लगा। मैंने देर न की समय रहते उसको थोड़ा शांत होने दिया । फिर बिना हाथ उठाये बात करना जारी रखा। उसका विश्वास जीता। धीरे धीरे रोज़ उसके उठने समय प्यार से उठाने का खास ख्याल रखा और धीरे धीरे अधिक आस पास रहने लगी । उसका चिड़ चिड़ापन जाता रहा। ये एक बार का काम नहीं। चिड़चिड़ापन लौट लौट आता है। फसल के बीच जंगली घास की तरह बड़ी मेहनत से छंटाई करनी होती है। बिना पौधे को क्षति पहुँचाये। माँ – बाप माली हैं।

बेटा ,
कहते हैं सोने से ठीक पहले
दिमाग में वो ही
बातें आती हैं
जो हम सबसे ज्यादा करना चाहते हैं ,
और रोजमर्रा की जरूरतों को
पूरा करते हुए नहीं कर पाते हैं।

मैं कल तक खुद को देखा करती थी
मैं हूँ मंच है और मेरे बाकी के शौक
पर बेटा अब पाँच सालों से
न रियाज़ में दिल लगता है
और न किताबों का रोग

मुझे ख्याल आता है
तुमसे बात नहीं हुई
आज आफिस निकलते
तुमको निहार नहीं गयी।

डाँट कर उठाया
धक्के से नहलाया
स्कूल भेजा जैसे तैसे
खुद भागी जैसे तैसे।

फोन की पूछताछ सामने से हो पाती तो
काश मैं भी बस यूँ ही तुमको
खेलते देख पाती तो
इतना सा शौक तुम्हारा
की” मम्मी बैठी रहे”
मेरी पानी की बोतल पास लेकर
मैं पूरा कर पाती तो।

मैं क्या कर लूंगी एवेंजर के खिलौने देकर
वो टूट के कचरा हो जाते हैं।
तुमको थोड़ी देर की खुशी तो दे जाते हैं
लेकिन ये चिड़चिड़ाहट कम नहीं करते
जो माँ के साथ बैठने से कम होती है
ये झुंझलाहट कम नहीं करते
जो तुम्हारी मीठी प्यारी बातें सुनने से कम होती है
तुमने ध्यान नहीं दिया है अब तक
क्योंकि तुम बहुत बच्चे हो।

वो 2016 का मार्च रहा होगा
तुम पूरे परिवार को एक साथ अलविदा कहने
तस्वीर खिंचवाने नहीं आये थे।
सबके सामने बड़ी जिद पे अड़कर
किसी बात पे जो गुस्सा के भाग आये थे
बहुत आक्रोश सा दिखाया बड़ों के सामने
बिगड़ गया पूरा कहलाये थे।
मैंने बहुत तेज़ मारा था
उस हरकत पर
तुम रोकर चुप हो गए
थोड़ी देर सुबक कर।
मुझे मेरा सबक दे गए
क्यों किया एक पांच साल के बच्चे ने ऐसा
मुझे सोचने पर मजबूर गए।

और आज का दिन है
दो साल से ऊपर होने को है
बिना कुछ सीखी तुम्हारी मम्मी
हर दिन सीख रही है
तुम्हे पालना ।
और सोचती है तकिये पर सिर रख
क्या कैमरों से देखते देखते
मैंने तुमको कम देखा?
तस्वीरों को खींचते हुए
खिंचती लम्बाई को कम देखा?
तुम बिन सिखाये साइकिल सीख गए
आज गलते ग्लेशियर की तस्वीर देखकर
बिन बताये समझ गए कि
“ऐसे तो मम्मी हमारी धरती डूब जाएगी”
कितने समझदार हो तुम बेटा
अपना भविष्य ग्लोबल वार्मिंग में डूबता देख सहम गए
इस समझ तक हमको आने में कुछ सौ वर्ष लगे हैं

देखो बेटा क्या हालत है!
केरल में कैसी आफ़त है!
पर मम्मी कल फिर ऑफिस जाएगी।
फिर वैसे ही चिल्लाएगी।
और तकिये पर सर रख रात में
यही सोचती जायेगी
क्यों करते हैं हम सब ये सब
क्यों न रहें बस साथ उन्ही के
छूट जाता है जिनका साथ जब तब।

धरती पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
मैं भी पूरी पानी पानी हो गयी बेटा
क्या दे रही हूँ तुमको
घिसते कदम और स्कूल का बस्ता
हर दिन कुछ घण्टों में फोन घुमा के
समय छह बजे से पहले खाने का वास्ता?

दादी माँ कहती थी
खाना जो प्यार से नहीं जाता
वो देह में भी नहीं लगता
भरसक तुम पतले लगते हो।

क्या कर गुजरने की छटपटाहट में बढ़े जा रही हूँ?
तुमको जी भर गले न लगाने में भी बिलबिला रही हूँ।
कभी इस पे निकलती है तो कभी उसपे ।
मुझे भी समझ नहीं आता कि भड़ास किस बात की?

पर ये जो केरल में आई बाढ़ है ना बेटा
वो मुझसे ये सब लिखा रही है।
बेमतलब पानी पैर तक आ गया है
जड़ें उखड़ रही हैं
पेड़ सर पर तैरने लगे
तिनके सा सिलेंडर बह रहा है
हम करोबार में डूब रहे हैं
बिजली काट दी गयी
न कोई सम्पर्क है न साधन
नानी से छुट्टीयों में चिट्ठी लिखने की कला भी नहीं सीख पाए
जब तक रौशनी थी कुछ बनारसी साड़ी के प्रिंट सा
हाथों पे मेहंदी लगाना सीखते रहे
पहले कलम से कॉपी पर
फिर सब बाढ़ के पानी में बह रहा है।
घर,नौकरी, पहचान, सब
बाढ़ के पानी में बह रहा है
दरअसल ये त्रासद नहीं है बेटा ,बस करवट है
ऐसी करवट तुम मत लेना।

गवाह है

तबाह है!
गाड़ी गाड़ी तबाह !
धूप में गर्मियों में
ट्राफिक की झलकियों में
गाड़ी गाड़ी तबाह है!
तबाह है!बन रही बन रही
मेट्रो बन रही
मुंबई में
तीन साल से
मेट्रो बन रही।बन रही बन रही
मेट्रो बन रही
मुम्बई में
तीन साल से
मेट्रो बन रही।Pragya Mishra गवाह है!

भूत बंगला कहानी – साइकिल

साइकिल बच्चों की दुमहिया पत्रिका है जो इकतारा इंडिया की तरफ से छपती है। मैं इसकी कहानियाँ मेरे बेटे के साथ बैठ पढ़ती हूँ, उसे साइकिल में दी चित्रकारी बहुत पसंद आती है।

आज नींद से पहले अभिज्ञान ने साइकिल से नरेश सक्सेना लिखित भूत बंगले वाली कहानी सुनी। गर्मी छुट्टी में ऐसी कहानियाँ बड़ी प्रिय होती हैं बच्चों को ।

प्लूटो और साइकिल ने बेड टाइम स्टोरीज़ के लिए अंग्रेज़ी की किताबों पर मेरी निर्भरता खत्म कर दी। हमारा देश भारत भाषा में समृद्ध देश है मेरी इक्षा थी मेरे बच्चे भारतीय भाषा में अच्छी कहानी पहले सुनें। मैं इकतारा के काम से बहुत प्रभावित हूँ और सबको कहूँगी की बच्चों को मार्वेल एवेंजर का दीवाना होने दें लेकिन हमारे होनहार लेखकों की कहानियों का स्वाद भी लगवायें ।

मुझे कहानी सुनाना अच्छा लगता है। कहानी सुनाते मैंने रिकॉर्ड भी किया है। सुनने के लिए यहाँ ड्राइव लिंक क्लिक करें। अपने बच्चों को सुनाएँ छुट्टियों में नई आदत लगायें ।

इकतारा के बारे में और जानने के लिए और उनकी वेबसाइट के लिए यहाँ क्लिक, करें ।

भेंट-घाट 19 मई

2008 में मुंबई आने के बाद जिन नए मित्रों से समय ने परिचय कराया उनमें एक नाम रहा श्रुति चित्रांशी का। हमने तीन साल साथ काम किया था। कच्ची परिवक्वता के दिनों की मित्रता में अलग खुशबू होती है, भिनी-भिनी सी कभी तो है भी की नहीं पता नहीं चलता कभी हल्के से अच्छा महसूस होता है।
कॉलेज से निकलते ही हम न तो समझदार होते हैं और न ही हमें ये पता है कि हम पोटेंशियल नालायक हरकत कर बैठने में अभी समर्थ हैं। ऐसे में जो दोस्त आपको झेलते हैं औऱ हंसकर साथ रह जाते हैं फिर उनसे लम्बी जान पहचान चल जाती है।

उज्जैन की रहने वाली श्रुति से भी अब मेरी बारह सालों की जान पहचान हो जाएगी।

आजकल श्रुति अपनी बेटी और पति के साथ थाईलैंड में रहती है। 2009-10 के साथ के दिनों में उससे कहे थे की उज्जैन जाएँगे तो तुम्हारे घर ज़रूर आयेंगे। तब ठीक तरह ये नहीं पता था कि भई उज्जैन जायेंगे क्यों। उन दिनों एक एड प्रचलित था एम पी टूरिज़्म का “रंग है रंग है रंग है , सौ तरह के रंग हैं…. महाकाल की पूजा सुख न कोई दूजा” इसकी धुन, बोल और चित्रांकन बहरीन है, उसमें एक तरह की ताकत है । गुलाल के रंग उड़ते जाते हैं और महाकाल शिव की भव्य आभा दिखाई जाती है। उसमें गजब का आकर्षण था। फिर श्रुति का घर उज्जैन में है महाकाल उज्जैन में है इसी तरह दोनी बातें तारतम्यता में याद रहीं।

नाना खेड़ा बस स्टॉप के पास श्रुति के मायके गई ।
अंकल आंटी की जो छवि उसने अपनी बातों में हमेशा साझा की थी वे उससे भी ज़्यादा प्यारे मम्मी पापा हैं। श्रुति का सन्तुलित स्वभाव , सौंदर्य , धैर्य , कलात्मकता और हँसता खिलखिलाता मस्ती करने वाले तेज़ दिमाग के जनक जननी के साथ हमने कुछ घन्टे बिताए। आंटी वाकई बेहद खूबसूरत हैं औऱ अंकल वाकई क्यूटेस्ट पापा। बोनस में देवास से आयीं बुआ जी और भाइयों से मिलना हुआ। प्यारी फुबु से मिलना हुआ जिसके लिए उसी के रंग की एक बिल्ली सॉफ्ट टॉय घर पर थी। अंशुमन फुबु को लेकर उत्साहित थे लेकिन वो हल्का से भौंकती की डर के “अबे ! अबे! ” कर बेड पर दुबक जाते।
ये अबे अबे की आदत दो साल के बच्चन को मोनू भैया से आई है और मोनू भैया को उम्र से तीन फर्लांग आगे के मित्रों से।

अंकल रिटायर हुए फरवरी में और अपना अच्छा समय गार्डनिंग में देते हैं तो हमने दोपहर के खाने के बाद बात-चीत के क्रम में उनके किचन गार्डन की झलकी ली ।जाते से अचानक वही पेड़ दिखा जो सुबह महाकाल मंदिर परिसर में देखा था और समझ नहीं आ रहा था कि यार ये पीपल है कि क्या है पत्ता पीपल जैसा है भी और नहीं भी। कुछ फल भी लटक रहे। इतने में अंकल-आंटी ने समाधान किया की बेटा ये “पारस पीपल” है।
शहर का हॉरिजॉन्टल फैलाव, बड़े पीपल बरगद , और पेड़ों के नीचे शिवलिंग और अन्य देवी देवता , हमारा बचपन ऐसे ही दृश्यों में बीता होता है इसलिए ये सब हमें आकृष्ट करते हैं।
कभी कभी लगता है अपने बच्चों को मेट्रो में बड़ा कर जीवनानुभव के कितने पहलुओं से दूर कर रही हूँ। वे जाने कैसे लिखेंगे मिट्टी के अनुभव।

कुछेक तस्वीरें लेने के बाद हमने गर्मी देखते हुए कूलर में वापिस बैठना उचित समझा। बेहतरीन चाय और कुछ बातों- वातों में समय निकला और शाम साढ़े चार में हम वहाँ से प्रस्थान कर गए ।उज्जैन दर्शन के लिए पवन ऑटो वाले का अपॉइंटमेंट आलोक पहले ले चुके थे और उसका फोन भी आना शुरू हो गया। कार में बैठ दूर होते हाथों को बाय बाय टाटा टाटा करते मैं सोच रही थी अंग्रेज़ भारत में नहीं आते तो हम नमस्ते कर के निकल जाते या ये वेव करने को कुछ हिंदी नाम दिया गया होता । अलविदा भी बारह सौ ईसवी के बाद आई होगी जब मुगल भारत आये। राजपुताना और मराठा वेव को क्या कहते होंगे?

कल्पना होटल आने तक यही अटर पटर बातें दिमाग में चलती रहीं , मैं अपने ही दिमाग को चुप कराती रहती हूँ ।

यादों की खिड़की

प्रज्ञा

यादों की खिड़की

ये यादों की खिड़की है। इसके पल्ले पुराने ढंग के है। ये बिना आवाज़ किये नहीं सरकती । दोनों हाथ लगते हैं और अंदर से खुलती है। बहुत सारे छोटे शहरों में है। बड़े शहरों के पुराने उम्रदराज़ इलाकों में पाई जाती है जिनमें होनहार बाहर-गाँव गए हैं। गाँवों में ईंट का पक्का मकान बिना पलस्तर के दसियों साल इसके पल्ले पर आकर खड़ा हुआ है ।
कोई बाल नहीं बनाती यहाँ खड़ी हो अब, लेकिन नीचे खड़ा लड़का रुक कर देख कर जाता है।
एक औरत जिसे दोपहर में अखबार तक पढ़ने की आदत नहीं थी वो यहाँ से गाड़ियों का आना जना देखती थी।
एक बच्चा आधा लटका रहता था इस पर किताबों से भाग कर गली के अनजान लोगों में पैटर्न ढूंढ़ने के लिए।
ये खिड़की लाऊड स्पीकर थी। यहाँ से चिल्लाने भर से भरी गली में काम का आदमी पलट कर हामी भर देता था।
इस पर आँखों इशारों से काम होते थे।
तनाव में धक्के से खुलती थी, थोड़ी नकारत्मकता इसकी लकड़ी सोख लेती । कहती थी कल सूरज को दे दूँगी वो जलता रहता है जलन पचती है उसे।

खिड़की धूप में बेरंग होती गयी। थोड़ी फीकी थोड़ी मटमैली होती गयी।लकड़ी फूल जाती है , सिकुड़ जाती है, अब पहले की तरह हिंज जगह पर नहीं मिलते । थोड़ा एडजस्ट करने पर ही बन्द हो।
बेजान हुई तो क्या मरम्मत मरम्मत तो खिड़की को भी लगेगी, यादों में जाले बड़े जल्दी लगते हैं। हमें लगता है हम बराबर सफाई करते रहे लेकिन जाला उधर से भी लगा होता है जहाँ हाथ नहीं पहुचंते ।

कयी सालों बाद जब पीसा जी से बात हुई थी। उन्होंने कहा था, क्यों प्राची “हम याद हैं न की भूल गयी पीसा जी को” । मैं हँस कर रह गयी क्योकि मैंने उन्हें कभी बताया ही नहीं वो मेरे जीवन में सुने पहले दास्तानगो हैं उनकी गर्मी की छुट्टियों में सुनाई भूत की कहानियाँ जो जमशेदपुर से राँची हाइवे के बीच की मनगढ़ंत घटनाओं के बुने ताने बाने थे मैं अब तक उसी हाव भाव में बच्चों को सुनाती हूँ। मुझे केवल वे ही कहानियाँ आती हैं।

तस्वीर साभार – उज्जैन की गलियों से ।

Pragya Mishra

मेरी अंग्रेज़ी

बैजू सर,चिन्मय बेनर्जी सर और दुबएन्दू बिस्वास सर की क्लासों से निकलने के लगभग सत्रह साल बाद अब मैं इतनी अंग्रेज़ी बोल और लिख लेती हूँ कि विचार बिना मानसिक ट्रांसलेशन के व्यक्त हो जाते हैं। मेरे कार्यालय में मैं बेहतर कम्युनिकेशन स्किल्स के लिए भी जानी जाती हूँ ।

इस दिन तक आने के लिए मैंने शुरुआत 2002 में बड़े पापा और बड़ी मम्मी के साथ बैठ राँची में उनके यहाँ की डाइनिंग टेबल से शुरुआत की थी । टूटी फूटी घबराई अंग्रेज़ी से। बिहारी का ग्रामर पुख्ता होता है इस चक्कर में बोलने में ट्रैफिक लगती है।

अर्पिता और प्रीति ने थोड़ा और खुले पन से बोलने का हौंसला दिया था। अर्पिता मुझे सारा दिन रंगोली दीदी के सीडी प्लेयर में ब्रायन एडम्स के गाने सुनाती थी। मैं कहती थी,” मैं नही सुनती इंग्लिश गाने यार मुझे कहाँ समझ आएगा”।

फिर उसने मुझे सुनाया:

“When you love a woman tell her that she is the one… ”

“Eighteen till I die”

“Summer of 69″

” So tonight we gonna wish upon a star we never wished upon before”

मैंने हनुमान चालीसा सुनने के जैसे ब्रायन एडम्स को प्रतिदिन सुना । एक हेड फोन अर्पिता के कान में एक मेरे कान में बीच मे ट्रिग्नोमेट्री के सबसे इजी ईजी सवालों को फटाक फटाक हल करते रहने का स्वांग। इस बीच ब्रायन एडम्स की सारी बातें मुझे बड़ी काम की लगती थीं। जैसे सत्संग चल रहा हो।

खैर ये तो दिनचर्या थी।

अंग्रेज़ अर्पिता और प्रेटी प्रीति , Jha सरनेम का लाभ उठा कर मुझे Miss J बुलाते थे और साथ मे मेरे मनमोहक एक्सेंट का अच्छा खासा तड़का भी लगाया जाता।
जैसे लिपस्टिक को लिपिस्टिक बोलना। सेवन को सेबुन बोलना। ओनली को वनली बोलना। पूरी ऐसी की तैसी कर देते।
सफर में काम आती गयी थोड़ी थोड़ी कांट छांट।

दिल्ली आना हुआ । सँजोग से outam lane के 1548 में भी फिर अर्पिता मिल गयी। यहाँ पटना की कृतिका किशल्या , स्वाति रॉय और थियेटर वाली रायना पांड के कॉंफिडेंट फर्राटेदार तेवर वाली तीन लड़कियों से भी आजीवन के लिये रूबरू हो जाने की घटना घटी , काल चक्र में इसी घटना ने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया।

डेढ़ साल तक द हिन्दू के एडिटोरिएल्स की मोनोटोनोस रीडिंग की, डिक्शनरी से वर्ड मीनिंग देख के सबके पाँच-पाँच सेंटेंस बनाये। अब मैं मिस जे से ट्रांजिशन होकर प्रग्गी हो गयी थी ।

सैकंड ईयर में आते आते एक दिन फिर अर्पिता उवाच हुआ :

,” प्रग्गी अपन एक काम करते हैं ये सब दीदी लोग सो जाएंगी तो तू और मैं स्टार मूवीज़ देखते हैं”।

मैंने कहा ” मैं इंग्लिश मूवीज़ नहीं देखती …कहाँ समझूँगी ….मैं कहाँ देखती हूँ।”

अर्पिता ने झाप दिया “चल चुप कर तू अब तो लिंकिन पार्क को सुनती है न। फिर!बारह बज रहे हैं एक मूवी देख के चलते हैं” ।

पहले कुछ महीनों में सबटाइटल्स के साथ देखा। फिर दिमाग को पात्रों के हाव भाव की आदत हो गयी, फिर उनका एक्सेंट समझ आने लगा अब रोज़ाना देखते-देखते कई शब्द वोकैब में जुड़ने लगे। थर्ड ईयर तक अर्पिता J D Lee से नोट्स लिखते पायी जाती थी और मेरे चार, HBO , Star Movies वगैरह पर बजने लगे। फरक तो भई मुझे लगता है हॉलीवुड पिच्चर से ही पड़ा। अब पता नहीं , किसी को कह नहीं सकते ।

वैसे अर्पिता को मैंने माचिस की तीली बार के गैस जलानी सिखाई। उसके बाद मैगी वो बना लेती थी । बस इत्ती सी शिक्षा के लिए आंटी ने मुझे बड़ी प्यारी बातों में थैंक्स कहा था।

उन हॉलीवुड की फिल्मों में मैंने कुछ ऐसी फिल्में गलती से देख लीं जिनका स्वाद लगने के बाद अपने जैसा सोचना, अपने मन की सुनना , अपने मूल रूप में रहना जैसे रिस्की विचार उभरे।

अटल सत्य यही है कि मेरे दोस्तों और शिक्षकों का बड़ा योगदान रहा मेरे आज तक मुझे लाने में। लेकिन मूल रूप तक आने में बड़ा समय लगा। शायद 2017 की जुलाई तक का। मैंने प्रथम प्रेम हिंदी से फिर बात चीत की। आजकल साथ रहते हैं। मुझे हिंदी अच्छी लगती है, हिंदी को मेरे माध्यम से कुछ कुछ लिखवाया जाना अच्छा लगता है। बहुत फकैत भरी कोशिश में एम. ए.करने के लिये केवल फीस पर फीस भरी है और सारी किताबें जस की तस पड़ीं हैं।

ये बार-बार आदमी टाइप राइटर क्यों हो जाता है, लिखते लिखते बाहर। अभी मोबाइल हाथ मे है तो मोबाइल देखें कि खींच के वापिस लाएं। हरजाई मोबाइल से केवल बताने का मामला निकलता है सीखने के लिए तो अब भी ऑफलाइन किताबें ही काम आती हैं।

Pragya Mishra