दिसम्बर’18 की डायरी के पन्नों से

मैंने चाय पी ली है।
अच्छे कपड़ों में हूँ ,
और दरवाज़ा बंद कर दिया है।
समाज से कट जाने के लिए।
क्यों और क्या से बच जाने के लिए।
बैठ बिस्तर पर शिथिल हाँथ-पाँव
छोड़ कर देह दिशाहीन संवाद लिए।

ऐसा होना सलान्त में अच्छी बात है,
शायद सुबह के तीन बज रहे हों।
इसके बाद भूत भविष्य के
सूरज को देख चिल्लायेगा
आहत करने की कोशिश करेगा
और सफल हो जाएगा,
किसी के बचाव करने तक।
“किसी?”
“ये किसी कौन है?”
“कमरे में केवल तुम हो
और मौन है।”
“लाइटें हैं, पंखा है
घरड़, घरड़,घरड़,घरड़
और कौन है?”

किंग साइज़ बेड और
बड़ी अलमारी के बीच
संकरी जगह में मेरा आकार
फिट हो गया।
दिसम्बर में मार्बल की ठंडक
अच्छी नहीं होती
ये जून थोड़े है।
पर खुद के कमरों की
चौहद्दी से भाग कर
अपना सा कोना
जैसा भी मिला
सुकून दे गया।

ज़मीन से आती ठंडक
बाद में देख लेंगे
पहले भरे पेट और
भारी मन से बाहर तो आएं।

ऐसी कसमसाहट की
छाती साँस नहीं ले पा रही।
अंतड़ियों में बैठ कर
कोई गुब्बारे फुला रहा है,
और तुम इस उपाय में हो
की अलादीन के चिराग से कहें:

“ट्रेड मिल खड़ी करो
बिस्तर सिकोड़ कर
अभी दौड़ते है
खत्म करनी है
गुड़ गुड़।”

“नहीं! ठहरो!”
“नहीं! ठहरो!”

जब अपनी सी जगह मिले
उसे बस एक ट्रेड मिल की
पसंद पर कैसे उजाड़ दूँ।

यहाँ आराम है,
निश्चिंतता है
और चिंताएँ सारी काल्पनिक।

इन कल्पनाओं से कहो
मेरा घर छोड़ दें
मुझे चैन से जीने दें।

अब बरामदे नहीं होते
मुट्ठियाँ ग्रिल नहीं पकड़ती
अब चाभी मेरी बैग में होती है
मैं जब चाहूँ जाऊँ
मैं जब चाहूँ आऊँ
कोई रोक नहीं रहा
कोई टोक नहीं रहा

बाहर तार पर
कोई जीन्स नहीं थी
मैंने दरवाज़ा नहीं खोला था
मैंने उनको खिड़की के
भीतर से देखा था।
वे बाहर ही थे,
क्योंकि पेड़ बाहर था
और मैं कमरे थी।

लाइट चली गई तो
एक कॉपी पर
वहीं अकेले बैठ
राम राम राम राम
लिखना हो रहा था
सुनी सुनाई बात थी
बिगड़ी बनाये राम,
शांति धारावाहिक का
एक पूरा एपिसोड
छूट कर बिगड़ रहा था।
रोज़ अकेले कमरों में
बचपन गुज़र रहा था।

ये जगह पहले मिलनी चाहिए थी
पीठ में दर्द नहीं होता
पैर और हाथ बड़े आराम से
दुबक सकते थे
खुद पर डायरी टिकाये।

इस संकरी जगह में
एक गद्दा काफी रहा
धँस कर सो जाने के लिए
और भी काम इस जगह में
निपट जायेंगे।
पढ़ाई , नौकरी, बच्चा
अब कुछ और समेटने कहीं नही जायेंगे।

यहीं पतीला में रखा जाएगा आंटा
और खूब सारा पानी
हड़ हड़ा कर गिर पड़ा है
खूब सारा पानी
आटा गीला हो गया
था खूब सारा पानी
कंगाली में आटा गीला
खूब सारा पानी
पत पत पत पत हुआ पतीला
खूब सारा पानी
और आटा एक घानी
खूब सारा पानी
मर्दन मर्दन लीपा पोती
नहीं सम्भलता बहा पसीना
तीर तीर के देखे आटा
नाखून उँगली हाथ हथेली
चिपका पिद पिद सानी
और डालो बिन सोचे समझे
खूब सारा पानी।

ये कौन सी मनोदशा का
घेरा डेरा झमेरा है
नहीं कह सकते पर
देखती हूँ तो लगता है
मैं बैठी हूँ
इस पसोपेश में
इतना गीला आटा बंधेगा कैसे
कैसे समेटूंगी इसकी बहती नाक
समेटूंगी! समेटूंगी!
आखिर कितनी बार समेटा है खुद को।
फिर एक और बार सही।

बिखर कर पसरते जाने में नशा है ,नींद है।
भारी मन में गुरुत्वाकर्षण कुछ अलग फार्मूले से काम करता होगा। वज़न तो चहकते कदमों में भी उतना ही रहता है मेरा लेकिन कभी कभी विशेष बल क्यों माँगती है ज़िन्दगी?

Pragya

6 thoughts on “दिसम्बर’18 की डायरी के पन्नों से

  1. बेड और अलमारी की बीच की जगह जितना आरामदायक सोफा कोई और हो ही नहीं सकता। जब मन भारी हो तो निर्जीव अलमारी ही मां के गोद की स्थानापन्न बन जाती है

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