आवाज़

पढ़ो खूब सारी किताबें,
कला और इतिहास की
देश और समाज की ,
समझो सारी कड़ियाँ
जिनसे होते हुए
तुम्हारा आज बना है,
एक स्त्री के लिए
क्या और क्यों ये
निर्धारित परिवेश बना है।

फिर बुलन्द करो आवाज़
बोलो , लड़ो ,बढ़ो
न सहो बेबुनियाद
वे रीति रिवाज़
जो तुम्हारी पह्चान
फलाने की बहू
से इतर निकलने नहीं देते।

प्रश्न करो स्त्रियों से
पुरुषों से रूढ़ियों से
तोड़ तो मनु के बनाये
वे नियम और समाज
का घुटन भरा ढाँचा,
जो विवाहोपरांत
तुम्हारे अंत: का संगीत
जीवित रहने नहीं देते।

ये औरत की स्वन्त्रता का नया स्तर होना चाहिए।
प्रज्ञा