चैंपियंस ऑफ द अर्थ

अब जबकी सारी बातें हो गयीं
हम “चैंपियंस ऑफ द अर्थ ” हो गए
और सारे मसले सुलझ गए
तो कछुए के गले का
प्लास्टिक निकालें!
उसकी कमर में
अलमुनियम की तार
लिपटी पड़ी है।
लोमड़ी मर्लपेट के डब्बे में
मूँह फँसाये पड़ी है।
उजले पोलर भालू
की तस्वीर में भुखमरी
का कुछ कर सकते हैं?
या की हम केवल प्रमाण पत्रों में
विलुप्त होते गैंडा प्रजाति को
कुछ दिन का मेहमान भर
घोषित कर सकते हैं?

हमने बूँद बूँद को तरसते लोग देखे हैं!
हमने डालडा के खाली गैलन को
ब्रह्मास्त्र में बदलते देखे हैं!

कल केरल ,आज ओडिशा
मेरे शहर का सी शेप शोर
आखिर उसे कब तक बचाएगा !
कभी तो पानी गले तक आएगा
क्या गाय गोबर गोमूत्र से ऊपर उठकर
ग्रेटा थेँबेर्ग की बातों पर
समय रहते गौर किया जाएगा?

Pragya Mishra