मेरी अंग्रेज़ी

बैजू सर,चिन्मय बेनर्जी सर और दुबएन्दू बिस्वास सर की क्लासों से निकलने के लगभग सत्रह साल बाद अब मैं इतनी अंग्रेज़ी बोल और लिख लेती हूँ कि विचार बिना मानसिक ट्रांसलेशन के व्यक्त हो जाते हैं। मेरे कार्यालय में मैं बेहतर कम्युनिकेशन स्किल्स के लिए भी जानी जाती हूँ ।

इस दिन तक आने की तैयारी टूटी-फूटी घबराई अंग्रेज़ी के साथ 2002 में बड़े पापा – बड़ी मम्मी के साथ बैठ राँची में उनकी डाइनिंग टेबल से शुरू की थी ।

बिहारी का ग्रामर पुख्ता होता है इस चक्कर में बोलने में ट्रैफिक लगती है।

अरावली अपार्टमेंट में मेरी रूमेट्स अर्पिता बसू और प्रीति झा ने थोड़ा और खुले पन से बोलने का हौंसला दिया था।

अर्पिता मुझे सारा दिन रंगोली दीदी के सीडी प्लेयर में ब्रायन एडम्स के गाने सुनाती थी। मैं कहती थी,” मैं नही सुनती इंग्लिश गाने यार मुझे कहाँ समझ आएगा”।

फिर उसने मुझे सुनाया:

“When you love a woman tell her that she is the one… ”

“Eighteen till I die”

“Summer of 69″

” So tonight we gonna wish upon a star we never wished upon before”

मैंने लगभग हनुमान चालीसा सुनने के जैसे ब्रायन एडम्स को प्रतिदिन सुना । एक हेड फोन अर्पिता के कान में एक मेरे कान में बीच मे ट्रिग्नोमेट्री के सबसे सरल सवालों को फटाक फटाक हल करते रहने का स्वांग। इस बीच ब्रायन एडम्स की सारी बातें मुझे बड़ी काम की लगती थीं। जैसे सत्संग चल रहा हो।

खैर ये तो दिनचर्या थी।

अंग्रेज़ अर्पिता और प्रेटी प्रीति , Jha सरनेम का लाभ उठा कर मुझे Miss J बुलाते थे और साथ मे मेरे मनमोहक बिहारी एक्सेंट का अच्छा खासा तड़का भी लगाया जाता।
जैसे लिपस्टिक को लिपिस्टिक बोलना। सेवन को सेबुन बोलना। ओनली को वनली बोलना। दोनो मेरी पूरी ऐसी की तैसी कर देते।

ज़िन्दगी के सफर में काम आती गयी थोड़ी थोड़ी कांट छांट।

2004 में स्नातक के लिए दिल्ली आना हुआ । सँजोग से outram lane के 1548 में भी फिर अर्पिता मिल गयी। यहाँ पटना की कृतिका किशल्या , स्वाति रॉय और थियेटर वाली रायना पांडे के कॉंफिडेंट फर्राटेदार तेवर वाली तीन लड़कियों से भी आजीवन के लिये रूबरू हो जाने की घटना घटी , काल चक्र में इसी घटना ने मुझे पाल पोस कर बड़ा किया।

डेढ़ साल तक द हिन्दू के एडिटोरिएल्स की मोनोटोनोस रीडिंग की, डिक्शनरी से वर्ड मीनिंग देख के सबके पाँच-पाँच सेंटेंस बनाये। अब मैं राँची की मिस जे से ट्रांजिशन होकर खालसा की प्रग्गी हो गयी थी ।

सैकंड ईयर में आते आते एक दिन फिर अर्पिता उवाच हुआ :

,” प्रग्गी अपन एक काम करते हैं ये सब दीदी लोग सो जाएंगी तो तू और मैं स्टार मूवीज़ देखते हैं”।

मैंने कहा ” मैं इंग्लिश मूवीज़ नहीं देखती …कहाँ समझूँगी ….मैं कहाँ देखती हूँ।”

अर्पिता ने झाप दिया “चल चुप कर तू अब तो लिंकिन पार्क को सुनती है न। फिर!बारह बज रहे हैं एक मूवी देख के चलते हैं” ।

पहले कुछ महीनों में सबटाइटल्स के साथ देखा। फिर दिमाग को पात्रों के हाव भाव की आदत हो गयी, फिर उनका एक्सेंट समझ आने लगा अब रोज़ाना देखते-देखते कई शब्द वोकैब में जुड़ने लगे। थर्ड ईयर तक अर्पिता J D Lee से नोट्स लिखते पायी जाती थी और मेरे सबुह के चार, HBO , Star Movies वगैरह पर बजने लगे।

फरक तो भई मुझे लगता है हॉलीवुड पिच्चर से ही पड़ा। अब पता नहीं , किसी को कह नहीं सकते ।

वैसे अर्पिता को मैंने माचिस की तीली बार के गैस जलानी सिखाई थी। उसके बाद मैगी वो बना लेती थी । बस इत्ती सी शिक्षा के लिए आंटी ने मुझे बड़ी प्यारी बातों में थैंक्स कहा था।

उन हॉलीवुड की फिल्मों में मैंने कुछ ऐसी फिल्में गलती से देख लीं जिनका स्वाद लगने के बाद अपने जैसा सोचना, अपने मन की सुनना , अपने मूल रूप में रहना जैसे रिस्की विचार उभरे।

अटल सत्य यही है कि मेरे दोस्तों और शिक्षकों का बड़ा योगदान रहा मेरे आज तक मुझे लाने में। लेकिन मूल रूप तक आने में बड़ा समय लगा। शायद 2017 की जुलाई तक का।

मैंने प्रथम प्रेम हिंदी से फिर बात चीत की। आजकल साथ रहते हैं। मुझे हिंदी अच्छी लगती है, हिंदी को मेरे माध्यम से कुछ-कुछ लिखवाया जाना अच्छा लगता है।

बहुत फकैत भरी कोशिश में एम. ए.करने के लिये केवल फीस पर फीस भरी है और सारी किताबें जस की तस पड़ीं हैं।

ये बार-बार आदमी टाइप राइटर क्यों हो जाता है, लिखते लिखते बाहर। अभी मोबाइल हाथ मे है तो मोबाइल देखें कि खींच के वापिस लाएं। हरजाई मोबाइल से केवल बताने का मामला निकलता है सीखने के लिए तो अब भी ऑफलाइन किताबें ही काम आती हैं।

Pragya Mishra