YourQuoteCollab- 30 June’19

Hi Friends,

This is my quote on “Night is not the time to” . I feel everyone have this phase in their life when they have been unnecessarily procrastinating.

So we should keep checking ourselves now and then to pick up get going, doing and prioritising things and people that matter.

When most of the people around you are educated and doing okay with money and health it is the time to take an edge by introspection. All of us have this small little demon inside us that tries to pull us back to lethargy , binge eating , giving up on things that need some hard work.

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पिसी और पिसा को वैवाहिक वर्षगाँठ की बधाई

सालहा साल
कई दिन आते रहे थे,
तुम बुलाते रहे थे
और अब जब
तुम्हारे उधर जाना नहीं होता ,
तुमसे मिलना नही होता
तुमको बताना नहीं होता
तो क्या इससे भी जायें ?
*चलो आज मौके पर मोहोब्बत जतायें।*

प्रणाम पिसी और पिसा जी ,

वैवाहिक वर्षगाँठ की अशेष शुभकामनाएँ । आप दोनों के चेहरे पर ये संतुष्टि ये मुस्कराहट इसमें बहुत ऊर्जा है जो अलग अलग शहरों में बसे आपके सारे घरों तक पहुंच जाती है।

एक दर से आपको ठहाकों में आँख मार कर ज़िंदगी मुट्ठी में कर लेते देखा है। आपकी कनखी वाली शैतान हँसी और झूठ-मूठ की डाँट मेरे जीवन की हासिल यादों में से एक है। गर्मी की छुट्टियों में या और कभी भी पिसा जी की सुनाई भूत की कहानियाँ मेरे जीवन की वो कौतूहल भरी अमिट कहानियाँ हैं जिन्हे , स्कूल , कॉलेज , ऑफिस और ससुराल तक मे सुना सुना कर मैंने वाह वाही बटोरी है। आज भी मेरे आस पास बच्चे जुटते हैं तो मैं जमशेदपुर से राँची हाइवे वाली सारी सही या मनगढ़ंत कहानियाँ उसी अंदाज़ में बयां करती हूँ जैसे पिसा जी पालथी मार कर पैर के अँगूठे पर हाथ फिराते फिराते आवाज़ में थोड़ा डर बना कर सुनाते थे। ये अलग बात है सुनाने के बाद उनके जैसी हँसी आती नहीं उसपर उनके स्टाइल का कॉपी राइट है।

बहुत सी बड़ी-बड़ी बातें जो नहीं लिखते क्योंकि सेंटी मत मार यार की आदत हो चली है । फिर भी आप दोनों का साथ धरोहर है यह लिखना तो बनता है।

सबसे प्यारी जोड़ी को *पिसा-पिसी की चूम बेटा* की तरफ से बहुत प्यार !

बारिश पर एक गीतिका

आज सुबह बारिश के घने बादल धीरज हिल व्यू के आसमान पर छाए दिखे तो मन यूँ ही गुनगुनाने लगा। प्रतिष्ठित हास्य कवि विपिन मलीहाबादी जी का सुझाव ध्यान आया की कविता लिखें तो तरन्नुम में गा कर लिखने की कोशिश करें। वही कोशिश आज की है। सुधार की गुंजाइश हमेशा । कुछ देर में गा कर इस ब्लॉग में रिकार्डिंग लिंक भी डालूँगी ।

फिर एक सुबह बरसात की
कितनी बातें याद की
बूँदों में झर झर बनती है
फिर नदियों को भरती हैं।

तुम आसमान का फरिश्ता हो
बारिश नाम तुम्हारा है
मिट्टी की और बच्चों की
तुमसे मुरादें खिलती हैं।

बहुत दिनों से सारी रात
कितने लोग न सोये हैं
खिड़की पे फैलाये हाथ
बादल के सपने बोए हैं,

आकर उनके दुख धो दो
कंधों पे झर सुख दे दो
पलक बुहारे आये हैं
पाऊसा तुम्हें बुलाएं हैं।

Pragya ❤️

क्षणिका-” अंधेरा”

थी काली रात और घना *अंधेरा*
फुटपाथों पर शहर सो रहा
सड़क फाड़ कुछ पीपल ठाड़े
चमगादड़ का पसरा पहरा
क्यों री डर कर कतराती है?
जब जब ऐसी निशा छाती है
नई सुबह जल्दी आती है।

यदि आप मेरी ब्लॉग पर नए पाठके हैं तो क्षणिका के बारे में समझने के लिए यहाँ क्लिक करें

*प्रज्ञा*

बेड टाइम स्टोरी – 23 जून 2019

बेटा,

#विंस्टन #चर्चिल की आत्मा फिर जीत का अट्टहास कर रही होगी , बड़े आये आज़ाद होने वाले , आदमीयत तो सम्भाली नहीं जाती स्वराज सम्भालेंगे । #Rascals, #Rogues and #Freebooters वाशिंदे ,राम के नाम को भुनाते दरिंदे।

ऊपर आसमान में हमारे शहीद मूँह लटकाए सोचते होंगे किस चोले में वापिस जाएं राम-रहीम को एक कराएं । इससे पहले की स्वामी विवेकानन्द की धरती के रहिवाशी होने पर हमको शक होने लगे मैं तुमको बताना शुरू कर देती हूँ कि हम आज़ाद हुए थे । ऐसा हाल ही में हुआ था।

हमारी आज़ादी में गाँधी बापू का योगदान था। उन्होंने अहिंसा का मंत्र दिया था। अहिंसा मतलब “बुरा मत सोचो” । गांधी जी का नाम “बापू” , रविन्द्र नाथ टैगोर ने रखा था , गाँधी जी ने उन्हें को “गुरुदेव” कहा।

ये अलग बात है कि आज अधकचरा पढ़े लोग ठीक वैसे ही ऐतिहासिक लोगों की पहचान जला रहे हैं जैसे कभी नालन्दा जलाई गई थी , महीनों तक। “देखो !अवशेष न बचने पाए , नए आका, नई साख बनायें ।”

बेटा, हमारे देश में लोग बहुत गरीब मेहनती रहे हैं। सबके पास पढ़ने आगे बढ़ने का ध्येय था। घर-घर में महान हस्तियों की तस्वीरों को देखते हुए आदमी का बच्चा बड़ा होता था जैसे भगत सिंह, चन्द्र शेखर आज़ाद , मौलाना अबुल कलाम आज़ाद, खां अब्दुल गफ्फार खां “सरहदी गाँधी” , मदाम भीकाजी कामा जिन्होंने भारतीय झंडे का प्रारूप तैयार किया था।

किसान , जवान , छात्र रेडियो सुनते थे, बाल जगत, युववाणी , रोज़गार समाचार, हिंदी के समाचार, अंग्रेज़ी के समाचार , उर्दू के समाचार। उर्दू बस भाषा की तरह देखी जाती थी । रूह अफज़ा एक शर्बत । ईद एक त्योहार । राम एक भगवान और हनुमान केवल राम के भक्त।

बीस-तीस साल के आम ग्रेजुएट लड़के अर्थ व्यवस्था , वाणिज्य , देश विदेश, राजनीति , न्याय व्यवस्था , असली साम्यवाद पर रीढ़ की हड्डी सरीखी चर्चाएं करते थे। वे चाय पीने के नए-नए शौकीन हुए थे पर उतना चलता है।धीरे- धीरे इस युवा की बौद्धिकता को पहले बी.पी.ओ सेक्टर के पचास हजार प्रतिमाह ने मारा था , फिर मैकडोनल्ड, के.एफ.सी ने दिमागी ताकत पर पोछा ही लगवा दिया। अब आज युवा पार्ट_टाइम_हत्यारा@मॉबलिंच का स्टार्टअप चला रहे हैं।

हमारे देश में मात्र अट्ठारह – उन्नीस की उम्र में शिव बटालवी जैसे संजीदा शायर, “लूना” के लिए साहित्य अकादमी जीत चुके थे । सफदर हाशमी से होनहार चौंतीस की उम्र में समाज सुधार की प्रक्रिया के दौरान बीच सड़क नुक्कड़ नाटक खेलते शहीद हो जाते थे।वे युवा आज चरस हो चले हैं।

“पढ़ना , लिखना ,सीखो ओ मेहनत करने वालों , पढ़ना लिखना सीखो ओ मेहनत करने वालों…. ” ये सफ़दर हाशमी जी की लिखी है तब दूरदर्शन पर आती थी। लोग साक्षर हों तब बस यही ध्येय था। अब लोग स्कॉलर हैं लेकिन निरे बटोरू । ज्ञान बटोर-बटोर के बटेर हो गए औऱ तितर-बितर होने की कगार पर हैं।

अच्छा! बहुत रात हुई कल तुम्हरा स्कूल है । वैसे भी अचानक सब खत्म नहीं होगा , हमारा देश सोने की चिड़ियाँ का अवशेष है अभी बहुत शान बाकी है , मिट्टी, पानी और हवा के पास समय कम हो सकता है । पर हम आदम की पुश्तों के अनुसार अब भी समय काफी है ।

आगे की और भी बातें मम्मी कल बताएगी।

शुभरात्रि।

Pragya Mishra

कामयाबी

मज़बूत नाखून से आती है
तनाव में चबाते नहीं जब।
तह लगी अलमारी में दिखती है,
कपड़ा लिये उधड़ती नहीं जब।
दिखती है बेझिझक बच्चे में
घर भर में घूमता-फिरता है ,
गिरता है , सीखता है, लिखता है!
नहीं कोई सवालिया डर उसकी आँखों में अब।
बहुत और आनी बाकी है कामयाबी
जैसे समय पर उठना सोना
खाना थोड़ा-थोड़ा बार-बार
खुद पर मेहनत अब नहीं तो कब?

प्रज्ञा

सौ वसुओं की मृत्यु का स्वांग

मेरे खुशहाल घर दरवाज़े से
ख़बर बताने वाली गली
भी निकलती है।
मैंने चुना है अनसुना करना।

निर्मम दृश्य और दंश
को अनदेखा करना
टीस मेरी नींद माँगती है
नींदें जान माँगती हैं
मैं ज़िंदा रह लूँ?

सह लूँ सारा सच ?
जिन्हें कन्धे से चढ़ते
कानों तक जाते अचानक
झिड़क दिया मैंने
कहीं धँस न जाएं हॄदय में
या फेफड़ों में बीच
जैसे एक कौर अटक जाती है
प्राण लेने तक
मैं साँस ले लूँ?

देख लूँ दाह के दृश्य?
जिनमें बिन सुलगी चितायें
चीत्कार से भस्म हो रहीं है।
माँ !
माँ आँखें खोल
तू क्यों रो रही है?

ये विभीषका नहीं
सवांगयुक्त मुक्ति है माँ!
सोच समझ कर
लिखी गयी है।

देख पानी खत्म हो रहा है
सब जलमग्न हो रहा है
धरती भाप हो रही है
मिट्टी पाप ढो रही है!

मैं निष्कंटक इस चक्र
से निजात पा रहा हूँ
कहो कहीं सभ्यता का
असमय अस्त हो गया सूरज
जाने कौन योनी जाऊँगा?
अच्छा है !अच्छा है!
गंगे मैं तड़के फिर
मर जाऊँगा ।

भविष्य ने देख लिया है अपना हश्र
उसे आदमी की प्रजाति से कोई उम्मीद नहीं बची
इसलिए संतति अजन्मी रहना चाहती है।

बहुत चोट लगे दर्द में पड़े आदमी को देखा है, वो मदद के लिए भी नहीं पुकार पाता उसका सारा शरीर इतना कट चुका होता है वो दर्द में सुन्न पड़ा रहा जाता है। लोग सुन्न पड़ गए हैं ।