अन्य कई भारतीय त्योहारों की तरह ईद का भी मुझे कोई अनुभव नहीं है। प्रेमचंद की ईदगाह , ईद से जुड़ी डिटेल्स से मेरा एक मात्र परिचय रहा हमेशा। बहुत गहरे सोचने पर याद आता है कि मम्मी पटना में ईद के समय ज़्यादातर सेवई नाश्ते में देती थी। भुने हल्के भूरे लच्छे गर्म दूध में घुल जाते थे उसमें अलग से चीनी भी नहीं देनी पड़ती थी । बेहद स्वादिष्ट। शायद बाद में अरुण अंकल भी दरभंगा में यही नाश्ता करा देते थे। इसके अलावा कुछ नहीं याद आता। कारण यही होगा की मेरे मुस्लिम मित्र न के बराबर रहे। आस-पास की कोई पारिवारिक जान पहचान भी नहीं। ऑरकुट और फ्री एस एम एस के दौर में फैशन के तहत ईद मुबारक करना शुरू किया था ।लेकिन साल 2019 में ईद समझ आयी मुझे ।

लोकसभा चुनाव के दौरान और पिछले कुछ सालों में इतना हिन्दू मुसलमान हुआ की एक धर्म विशेष की तरफ मेरा भी ध्यान चला ही गया। फिर खुद ही समझने के लिए मैंने एक आध फेसबुक मित्रताएँ स्वीकार भी की और म्युचुअल फ्रेंड्स देख मित्रताएँ भेजी भी।

फेसबुक कुछ भी समझने का आधार नहीं है पर आदमी टाइम पास की ज़िंदगी में ज़िन्दगी के हुनर ज़्यादा सीख जाता है। फिल्टर अपना अपना।

फिर रमज़ान की पहली सरगी के अपडेट्स देखे। आम मुसलमान मित्रों ने अपने जीवन से जो प्यारी खूबसूरत तस्वीरें टाइमलाइन पर साझा की उनको देखा।बहराइच के ज़ीशान वारसी ने बताया की ईद केवल दो तरह की होती है और दोनों के बारे में अंतर समझा दिया, उनके अलग अलग नाम बताये।

हिंदी मुहावरों से “ईद का चाँद होना” और बॉलीवुड के गानों जैसे ” जुम्मे की रात है..” का मतलब तो समझ मे ऐसे भी आ गया था पर ये दुर्गा पूजा के दस दिन की तरह रोज़ा के 30 दिन इसी बार समझ आये जब टाइमलाइन पर आभासी मित्रों के अपडेट दिखते रहे!

एक विडियो भी देखी जो मुस्लिम मित्र खेमे से ही घूम के आ सकती है औऱ वो वाकई बेहतरीन लगी मुझे जिसमें अंत में अल्लाह कहते हैं

“जिसके जुर्मों को चालीस अपने पर्दे में रखा, गुनाह कबूल करने पर उसका नाम तब कैसे बता दूँ?”

“O Musa, I hid his sins fir forty years , do you think after his repentence I shall expose him”

कहानी कुछ ऐसे थी कि जिले में सूखा पड़ता है तो लोगों की फरियाद पर अल्लाह कहते हैं कि तुम्हारे बीच किसी ने बड़े गलत काम किये हैं उसकी वजह से इलाके में पानी नहीं हो रहा । वह सामने आकर गुनाह कबूल करे तो पूरे इलाके की खैरियत होगी। वह आदमी सबका दुख देखकर पछताता है और खुद आगे आकर माफी मांगता है। लेकिन अल्लाह उसकी आँख से पहले आँसू की बूँद गिरते से सबके लिए पानी बरसा देते हैं। वे किसी को कुछ नहीं बताते। वीडियो के माध्यम से मुझे रमज़ान के आखिरी दस रातों की दुआ का महत्तव समझ आया। वह वीडियो अगर आप भी देखना चाहें तो यहाँ क्लिक करें।

सुबह गूँज समूह के संचालक आदरणीय मुकेश जी का ब्रॉडकास्ट आया , “ईद” पर क्षणिका लिखिए। अपनी ऑडिट रिपोर्टिंग में मशगूल हमने जवाब दिया,

” कोई अनुभव नहीं है क्या लिखें।”

उन्होंने कहा। “हमें भी नहीं है।”

उसके बाद ये शानदार क्षणिका मुकेश जी ने लिखी और मैरिड मैन किचन में खूबसूरत रूह अफ़ज़ाई चार गिलासी तस्वीर साझा की जिसमें हर गिलास में चार बर्फ़ के टुकड़े और गार्निश की तरह ऊपर एक सुन्दर हरा पुदीने का पत्ता था जो ज़रूर उनके ही किचन गार्डन से होगा।

“हुआ खुशामदीद
जब पलकों ने खोली
नजर की खिड़की
और हुई तुम्हारी दीद

दिल ने हौले से कहा
जान हैप्पी ईद !”~मुकेश~

वाह! देखिए अनुभव प्यार का मोहताज नहीं त्योहार का।

मैंने अन्य कवियों की क्षणिकाओं का भी आनंद लिया और कार्यालय के काम करती रही।

शाम 7.30 पर विनीता ने आवाज़ दी ,”यार तुम कह रही थी किसी एफ. एम. पर कोई रिकॉर्डिंग डालनी है तुम्हे तो जाओ भी अब। ”

मैंने फटाक से लास्ट अपडेट मारी और पर्स लेकर थोड़ी लंगड़ाती चाल में नाहक तेज़ चलती हुई बाहर निकली की सामने से आवाज़ आयी

“प्रज्ञा , जल्दी में हैं , इधर होते जाईये !”

अकचका के देखे तो पठानी गेटअप में स्पोर्ट्स मोबिलिटी टेस्टिंग टीम का सलमान था। इससे पहले की कुछ समझने की कोशिश करती उसने आगे से कहा।

“ईद मुबारक, प्रज्ञा! खीर खायें।”

तकरीबन बारह तेरह लोग सब जुटे थे स्नैक्स एरिया में और खीर वाकई शानदार थी। मैंने कहा :

“सलमान ,जमघट लगा दी तुमने तो कुछ सुनाओ भी। ”

अब सुनाया क्या जाए, पन्द्रह लोग आमने सामने बैठ कर चुपचाप खा रहे थे संवाद हीन। तब गूँज की क्षणिकाओं का ख्याल आया , मैंने सबका नाम लेकर सारी पढ़ी :)वाह वाह तो आई टी वालों को भी आती है । वे सारी क्षणिकाएँ इस प्रकार हैं:

उम्र का बंधन चहिए
मेरी अज्ञात हमसफ़र
क्या तुम आओगी ?
इस ईद में मुझे ईदी दे जाओगी
या करना पड़ेगा इंतजार
मुझे अगले ईदी का …
~~~मिन्टू

मनाई ईद देखकर जिस चाँद को दुनिया ने
वहीं एक चाँद मेरा जाकर बदली में छुप गई…
—प्रवीण

जब तक हो ना तेरी दीद !
क्या मेरी दीवाली, क्या मेरी ईद !!
— पी.के.शर्मा

शहर में चर्चा है कि चाँद निकल आया
तुम छत पर आ जाओ कि मेरी ईद हो जाए.
—-अनिल

इन निगाहों को जिस घड़ी तेरी दीद हुई,
आसमान को तके बिना, तभी इनकी ईद हुई।
—–अनुपम

जश्न मनाएँ आप-हम, हुई चाँद की दीद
गिले-शिकायत भूल कर, कहें मुबारक ईद
—हिमकर श्याम

ईद नयाब तोहफ़ा, मिटा देता है दूरियां,अरे इतना न ताको चाँद को,कुछ तो सोचो कितनी बढ़ा देते हो इसकी बेचैनियां।
—शैल पटले

आदरणीय ज्योति खरे जी की कविता से आज मेरे ऑफिस के कई लोगों को नया उर्दू शब्द “बोसा” सीखने मिला।

आखिर में चलते चलते फेसबुक मित्र कमलेश राठोर जी की वाल से एक ज़ोरदार क्षणिका उठा ली और सभी की खीर पार्टी मुक्कमल हो गयी।

“हौंसलों में फिर नई उम्मीद होनी चाहिए
हो गए रोज़े मुकम्मल, अब ईद होनी चाहिए”

घर आकर अपराजिता शर्मा की वाल से उनकी खूबसूरत अलबेली की प्यार भरी ईद मुबारक को अपना स्टेटस बनाया।सबको ईद मुबारक!