शतदल पर बेटा अभिज्ञान -दूसरी कड़ी

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हेलो दोस्तों।

कुकू एफ एम पर शतदल के श्रोताओं को प्रज्ञा का नमस्कार ।
आज बुधवार है, आप सुन रहें है “इतनिमान के ख्यालात”।

दोस्तों पिछली कड़ी में आपने सुनी कविता “बेटा अभिज्ञान” , जिसमें परवरिश से जुड़ी अपनी सीख को मैंने कलमबद्ध किआ और आप सभी के सामने रखा।
बेटा अभिज्ञान की दूसरी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए मैं चर्चा करना चाहूँगी कुछ और पहलुओं के बारे में जैसे किस तरह एक बच्चे को हम उसका पूरा बचपन एक बच्चे की तरह जीने में मदद कर सकते हैं। हमारे देश में परिवारों में इतना आर्थिक अभाव रहा है कि बच्चे असमय जिम्मेदार हुए हैं। इसको हमने बाहें चढ़ा गर्व से भी बोला है और खुद अकेले लिखते हुए ऐसे भी जिया है कि ये बचपना पचपन की उम्र में न करता यदि मेरा अंत: उन छोटी ख्वाहिशों से भरा होता ।
बचपन बहुत ज़रूरी दौर है, वाकई ये बच्चे का सौभाग्य होता है यदि उसे सन्तुलित व्यवहार वाले माँ बाप मिलते है।

“चिकन सूप फ़ॉर द सोल” किताब की कुछेक कहानियों से मैंने ये सीख ली है कि चाहे आप कुछ भी करते हों रात में अपने बच्चे को प्यार कर के सुलायें पुकारें उसे कहें कि आप उससे प्यार करते हैं और वो एक बेहतरीम इंसान है। बच्चा बड़ा होगा भावुकता उसमें ज़िंदा रहेगी इंसान बनेगा।

अपने बच्चों को सबके सामने आओ बेटा ये गाना वो डांस अंकल आंटी को दिखाओ कविता सुनाओ इससे बचना चाहिए। ऐसा करने से बच्चा पब्लिक पेरफॉमन्स में बोरियत महसूस करता है और स्पीकिंग स्किल्स खराब होती है।

बच्चों को किस तरह की सुविधा मिल रही है यह बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति क्या है, परिवार का आकार क्या है, महानगर में हैं, मिड टियर सिटी में हैं या गांव में हैं।परिवेश कुछ भी हो बचपन की अवधि को असमय न मरने देना ही परम उद्देश्य होना चाहिये।

न तो बेतरतीब खिलोने और मोबाइल से लादना चाहिए । न घर के काम में असमय डांट डांट लगाना चाहिए । पढ़ने दें । अच्छी किताबें पढ़ने दें। साथ पढ़ें भी बच्चा अकेले बोर होता है। साथ मे बोर्ड गेम्स खेलें , पेड़ पौधों की बातें करें, क्या देखा रास्ते में, उस जगह की मिट्टी का रंग काला था या लाल था, मिट्टी रेतीली थी या गीली थी, पेड़ में किस रंग के फूल थे, आस पास बंगलो बने हैं या केवल अट्टालिका देख रहे हो जैसी विविध बातें करें। कार के ब्रेंडस से लेकर, खिलाड़ियो के नाम, दुनिया भर में खेले गए खेलों के नाम, देश विदेश के नाम की अंताक्षरी वगैरह के साथ समय व्यतीत करें। जितना हो सके खिलोने मोबाइल से ज़्यादा एक दूसरे की ज़िंदगी मे शामिल हों ताकी बच्चा जब बड़ा हो सोचे लिखे तो उसकी यादों में लड़ाई भी आपकी गोदी के लिए हो और प्यार भी आपके आगे पीछे दौड़ने के लिए हो।

बच्चों को दी जाने वाली गिफ्टस,में भी बैलेंस का बड़ा मसला है। अगर हमने खुद अभाव ग्रस्त जीवन जिया होता है तो हमें लगता है कि इसके पास अच्छी किताबें हों, पेंसिल , इरेज़र , शार्पनर सब बढियाँ हों, अच्छे कपड़े खिलोने के सेट मिलें । उसे अपना नया किड्स लैपटॉप दिलायें , छोटी वाकी टाकी भी दें । मने जो खुद का पूरा नहीं हुआ उसे भर के खुद से पूरा समझें। लेकिन इस प्रकिया में बड़ी सावधानी चाहिए ।

ज़रूरत से ज्यादा आसानी से चीजें मिलने लगे तो उनमें अर्जन करने की प्रवृत्ति नहीं आएगी। अत्यधिक ही कमी करें तो दूसरों से लेकर या शायद मांग कर अपने मन की पूरी करने की कोशिश करेंगे। उनकी सभी मांग भी पूरी नहीं कर सकते और बात बात पर झिड़क कर हर माँग को बेकार भी नहीं ठहरा सकते। कभी सख्त होना पड़ता है , तो कभी बहलाना पड़ता है। पर अभिभावक की तरह हम जो भी करें भावावेश में नहीं करें ये ज़रूरी है।

बच्चे को पारिवारिक साथ और सन्तुलित प्रेम से आत्म विश्वास से लैस करना बहुत ज़रूरी है। इससे वे ज़िम्मेदार नागरिक बनते हैं और हिंसक प्रवृत्ति के नहीं होते।

तो आइए इस सिलसिले में सुनते बेटा अभिज्ञान कविता की दूसरी कड़ी।

इसको जी भर के शार्पनर कटर पेंसिल रबर
यूज़ करने देती हूँ।
जा जी भर छील जितने छिलने हैं ,
डॉम्स नटराज अप्सरा के रंग रोगन वाली
ग्रेफाइट की डंडियाँ ।

मैं किसी खास दिन के लिए नहीं बचाऊंगी ,
क्योंकि आज़ादी को वैसे भी सत्तर साल हो गए हैं
और मूल भूत सुविधाओं में तुझे
जब मर्ज़ी चॉकलेट खाने की आज़ादी दी गई है।

रविवार की सुबह सुबह हम तुझे
आइसक्रीम ना खाने के पॉइंटर नहीं गिनाते हैं
और मंदिर ले जा कर सरेंडर भी नहीं ही कराते हैं,
तो फिर लाल गुलाबी डंडियों की
छाल को घुमाते रहने देने में क्या ही हर्ज़ है।

बस छोटी हो जाती हैं पेंसिलें निर्थक कटते रहने से,
अभी फेक देते हो क्योंकि समझ नहीं है
थोड़ा सोच फैलेगी तो देखोगे जहां काम आवे सुई
तन्नी गो पिंसिल कंपास में बढियाँ फिट हुई।

कितने तरह के इरेजर्स तुम्हे चाहिए भर लो मन
ताकी ललक टेलिस्कोप के लिए बची रहे
किसके पेंसिल बाक्स में क्या है उसमें मन ना बहे।

सब कुछ तुम्हें तुम्हारा अपना दिया जाएगा,
लेकिन एक कमरे में मेरे साथ ही सो रहो अभी
एक दिन तो तू बड़ा हो ही जायेगा।

तुम्हारी अलमारी अलग,
किताब के ताखे अलग,
अलग बैठक ,
अलग रखी है स्टडी
लेकिन बेटा –
“प्लीज़ ग्रो अप लिल स्लो एंड स्टेडी।”

मेरे दिन नौ घन्टे से बारह के हो जाते हैं
हफ्ता महीना साल तिमाही के हो जाते हैं।
नहीं होता है तो एक टक देखना
की अब गेंद तुम्हारे बल्ले से कैसे शॉट खाती है
स्टाइल तुम्हारा , हैबिट्स, कुछ शब्द
रोटियाँ सेकते सेकते मेरे कानों तक जातीं है।

ठुड्डी पे चोट लगी थी
दिखा ही नहीं मुझे
तुमको पकड़ के
कितनी लगी
कैसे लगी
नहीं पूछा मैंने
रहती तो ऐसे होता
रहती तो वैसे होता कर
गुस्सा आया मुझे,

गुस्सा अक्सर आता है,
तुम इतने काबिल दार की
हामी में सिर हिला कर
चट पूरी दूध रोटी निपट देते हो
बैग जगह पर धर देते हो।
बटन ऊपर नीचे ही सही
बस के छूटने लटकने तक
पूरा तैयार हो लेते हो।

मैं उस पर भी हिसाब बंद नहीं करती
मेरे फेफड़ो में सांस नहीं
कार्बन भर रहा है
बहुत काला
शायद दिल तक पहुंच गया है।

तुम पर छोड़ देती हूँ
तुम कर लेते हो।
सोचती हूँ कैसे थोड़ा अपने
स्वार्थ में ही तुम्हे स्वावलम्बी
न बनने दूँ।
ममता की खुराक का
दाना-पानी बचे रहने दूँ।

पर घड़ी आड़े आ जाती है,
गाड़ी आड़े जाती है,
पहिया आड़े आ जाता है,
एक पैर से,हाँके जाना है
स्टैंडर्ड सुविधा वाला
तगड़ा जीवन बनाते जाना है।

बेटा साँचा शायद रेक्टेंगल का था
देखो कितना पढ़ लिख कर
मम्मी ट्राइंगल फिट कर रही थी।

बचपन में बड़प्पन जीना अच्छी बात नहीं है
बड़प्पन में बचपना हुआ जाता है।
जितने खाली घर में फलांग नहीं मारी
उनपे ही मन चला जाता है।
इसलिए तुम्हारे हिस्से का जितना
आज में जायज़ है
सब कुछ तुम्हे रूचि पूर्वक दिया जाता है।

मित्रों मैं आपकी तरह एक साधारण कामकाजी व्यक्ति हूँ किसी मसले की एक्सपर्ट नहीं , थोड़ी अत्यधिक ही भावुक हूँ और आस पास या अपने जीवन में जो घटित होता देख रही उसे कविताओं के माध्यम से रखती हूँ। आज का एपिसोड आपको कैसा लगा इसपर अपनी राय रखें और कार्यक्रम पसन्द आने पर शतदल को फॉलो करें कार्यक्रम लाइक शेयर जरूर करें।

One thought on “शतदल पर बेटा अभिज्ञान -दूसरी कड़ी

  1. शब्दों का समायोजन बेहतरीन है ।आस पास की बातों को कविता में समेटना ।वाह।

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