क्षणिका-” अंधेरा”

थी काली रात और घना *अंधेरा*
फुटपाथों पर शहर सो रहा
सड़क फाड़ कुछ पीपल ठाड़े
चमगादड़ का पसरा पहरा
क्यों री डर कर कतराती है?
जब जब ऐसी निशा छाती है
नई सुबह जल्दी आती है।

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*प्रज्ञा*