बारिश पर एक गीतिका

आज सुबह बारिश के घने बादल धीरज हिल व्यू के आसमान पर छाए दिखे तो मन यूँ ही गुनगुनाने लगा। प्रतिष्ठित हास्य कवि विपिन मलीहाबादी जी का सुझाव ध्यान आया की कविता लिखें तो तरन्नुम में गा कर लिखने की कोशिश करें। वही कोशिश आज की है। सुधार की गुंजाइश हमेशा । कुछ देर में गा कर इस ब्लॉग में रिकार्डिंग लिंक भी डालूँगी ।

फिर एक सुबह बरसात की
कितनी बातें याद की
बूँदों में झर झर बनती है
फिर नदियों को भरती हैं।

तुम आसमान का फरिश्ता हो
बारिश नाम तुम्हारा है
मिट्टी की और बच्चों की
तुमसे मुरादें खिलती हैं।

बहुत दिनों से सारी रात
कितने लोग न सोये हैं
खिड़की पे फैलाये हाथ
बादल के सपने बोए हैं,

आकर उनके दुख धो दो
कंधों पे झर सुख दे दो
पलक बुहारे आये हैं
पाऊसा तुम्हें बुलाएं हैं।

Pragya ❤️